अब तुम्हारे हवाले

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आजादी के बाद राजभाषा के रूप में फंक्शनल हिंदी को दिशा देने की जिम्मेदारी मिली, वह बखूबी निभाई है। देश के हर गैर हिंदी भाषी क्षेत्र से अध्यापक, छात्र आते रहे हैं। हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के लिए एक समरसता का यहाँ निर्माण हुआ है। हस्त लिखित हिंदी से टाइप राइटर के रिबन से होती हुई आज कंप्यूटर और इंटरनेट तक की हवाई यात्रा में संस्थान का योगदान किसी से कम नहीं, बस शांत और समगति से होने के कारण यह प्रगति सहज न दिखी। मुझे लगता है कि स्वर्ण जयंती से हीरक की यात्रा का पथ कठिन हो, पर दुरूह नहीं। क्षेत्र बहुत विस्तृत है। लक्ष्य स्पष्ट है, सारी धुंध छँट जायेगी।

लेखक- शंकर लाल पुरोहित

यह किसी क्षेत्र, राज्य अथवा देश की धरोहर नहीं है। आज यह विश्व के लिए हिंदी का गवाक्ष बन गया है। विश्व हिंदी की चेतना और संकल्प इसी कैम्पस में अंकुराया है। मोटूरि जी, ब्रजेश्वर जी, राजगोपालन जी, सुरेश कुमार जी से लेकर विजय कुमार, भरत जी तक लंबी सूची है जुड़े लोगों की। कुछ ही नाम लिए हैं, स्मृति-विभोर होकर बहुत कुछ भूल रहा हूँ। दरअसल मेरी हिंदी की लगभग सारी पढ़ाई अनौपचारिक हुई। हिंदी का 'मुहावरा' तो बार-बार के सत्रों में संस्थान से ही सीखा। वही बाद में अनुवाद के समय बहुत काम आया। लगता है, उस कार्य से संतुष्ट होकर संस्थान ने बहुत बड़ा पुरस्कार भी दिया। पर, मुझे इतना भान हो गया कि मेरे अनुवाद कार्य पर इससे भारत में हिंदी भाषा की सर्वोच्च संस्था से स्वीकृति की मुहर लग चुकी है। संशय, दुविधा, संकोच के सारे बादल छँट गए। तब से आज तक मैंने मुड़कर नहीं देखा। अनुवाद चल ही रहा है।

शुरू-शुरू में जब आया था तो बड़ा संकट था। भवन किराये का, भोजन बाहर होटल में, लाइब्रेरी व्यवस्थित नहीं। बस एक ही आश्वासन था, सब ठीक हो जायेगा। परंतु मेरे सत्र तो ग्रीष्मावकाश में होते। मई में आगरे की गर्मी ओड़िशा वाला कितना सहे? यह बात 1971-1972 की रही है। डाइरेक्टर के कमरे में पहुँच कर रो पड़ा। उन्होंने कहा- अरे, भई क्या हुआ? सर, मुझे रिलीव कर दें। मैं गर्मी सह न पाऊँगा। वे सहानुभूति की हँसी में ठहाका लगा बैठे। अरे! भई अध्यापक, हिंदी के अध्यापक, बहुत सहना होगा। खैर अब ज्यादा नही, चार दिन मेरे कहने पर रुको। बारिश हो जायेगी। मैं आज्ञाधीन था। सूने आकाश के नीचे छत पर सो गया। तारों का चलना देखता रहा। तीन रातें बीतीं। कोई परिवर्तन नहीं मौसम में। चौथी रात मन में थी, आज भर देखना है, कल तो रिलीव कर ही देंगे। पंरतु मध्य रात्रि! आँख हल्के से झपकी ही थी कि मोटी-मोटी बूँदें टपकने लगीं। उठ कर नीचे कमरे में आये। एकदम मौसम बदल गया। मेरा प्रशिक्षण (गहन पाठ्यक्रम) निर्विघ्न पूरा हुआ। यह जड़ संस्थान नहीं है, हिंदी का दिल है, स्पन्दनशील है, गतिशील है। इसे साहित्य सृजन पीठ न मानें। परंतु भाषा को दिशा देने के लिए कई बार समस्याएँ आयी हैं। उनका समाधान केंद्रीय हिंदी संस्थान में मिला है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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