आखिर आगरा क्यों?

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लेखक- डॉ. न. वी. राजगोपालन

50 वर्ष पूर्व 1961 में केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना हुई। भारत सरकार द्वारा गठित केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के अधीन संचालित इस संस्था का इतिहास वास्तव में उससे भी पुराना है। 1951-52 में 'अखिल भारतीय हिंदी परिषद' नामक संस्था का गठन हुआ था। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी प्रचार के कार्य से संबद्ध व्यक्तियों तथा हिंदी के विद्वानों का यह संगठन था। हिंदीतर भाषा प्रदेशों में हिंदी शिक्षण तथा प्रशिक्षण को राष्ट्रीय स्वरूप देने के उद्देश्य से इस परिषद की स्थापना हुई। इसके अधीन आगरा में 'अखिल भारतीय हिंदी शिक्षण विद्यालय' आरंभ किया गया। इस कार्य के लिए आगरा को क्यों चुना गया- इसके पीछे यह कारण था कि हिंदी भाषा का स्वरूप उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि स्थानों में निम्न होते हुए भी उसका एक मानक माना जाता है। खड़ी बोली हिंदी का यह मानक स्वरूप आगरा, मेरठ, दिल्ली के क्षेत्र में प्रचलित व्यवहार पर आधारित माना जाता है। इसी कारण से आगरा में विभिन्न क्षेत्रों के हिंदी अध्यापकों को प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया शुरू की गई।

1961 में भारत सरकार ने 'केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल' नाम से इस कार्य को अपने हाथ में लिया ओर हिंदी शिक्षण संस्थान की स्थापना की गई।

इसी संदर्भ में 'प्रयोजनमूलक हिंदी' की बात चलाई गई। हिंदी साहित्य एवं हिंदी भाषा दोनों अभिन्न रूप से जुड़े रहने पर भी भाषा का विस्तार साहित्य के क्षेत्र से भी परे होता है। सामान्य जन-जीवन में, व्यापार में, प्रशासन में, बैंक जैसी संस्थाओं में तथा अन्यान्य व्यावहारिक क्षेत्रों में भी भाषा का प्रयोग होता है। यह साहित्य की शैली से भिन्न है। वास्तव में साहित्यिक भाषा के विभिन्न प्रयोग क्षेत्रों में से एक है। इस बात को दृष्टि में रखते हुए भाषा का शिक्षण होना चाहिए। हिंदी संस्थान ने इस क्षेत्र में बहुत कार्य किया है। इसके लिए हिंदी की आधारभूत शब्दावली, आधारभूत वाक्य रचना आदि को पहचानने का प्रयास किया गया है। बैंक जैसी संस्थाओं के लिए प्रयोजनीय भाषा स्वरूप को निर्धारित किया गया। हिंदी संस्थान की सामग्री निर्माण विभाग की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी। मिजोरम जैसे क्षेत्रों में जहाँ की संस्कृति अन्य प्रदेशों से काफी भिन्न है, विशेष पाठ्यपुस्तकें तैयार की गईं। इसके लिए संस्थान के अध्यापकों ने उन क्षेत्रों में जाकर वहाँ की जीवन-रीति और नीति आदि का अध्ययन किया। इसके आधार पर पाठ्यपुस्तक तैयार की गई।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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