आखिर आगरा क्यों? 3

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भारत सरकार के प्रशासन से हिंदीतर भाषी अधिकारियों के लिए तीन महीने का भाषा-शिक्षण का पाठ्यक्रम तैयार किया गया। दिल्ली में इसके लिए केंद्र खोला गया।

  1. हिंदी संस्थान का मुख्य उद्देश्य हिंदी के राष्ट्रीय स्वरूप का विकास करना है।
  2. जीवन के विभिन्न संदर्भों में हिंदी प्रयोग के लिए आवश्यक सामग्री तैयार करना है।
  3. हिंदी शिक्षण की पद्वति को विकसित करना है। हिंदी एवं हिंदीतर भाषा में विद्यमान अंतर और समानता को पहचान कर उसके आधार पर पाठ्यपुस्तकें तैयार करना है। इन उद्देश्यों को दृष्टि में रखते हुए संस्थान में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से अध्यापक चुने जाते थे। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, मणिपुर आदि सभी क्षेत्रों के विद्वान संस्थान में कार्य करते थे।
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हिंदी शिक्षण निष्णात के पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को शोध निबंध प्रस्तुत करना होता है। इनके विषय अधिकतर तुलनात्मक होते हैं। हिंदी साहित्य एवं क्षेत्रीय भाषा का सहित्य, हिंदी भाषा एवं क्षेत्रीय भाषा इनकी तुलना पर आधारित अनेक शोध निबंध प्रस्तुत कराए गए। यह अमूल्य सामग्री है।

हिंदी संस्थान के द्वारा शोध गोष्ठियां आयोजित की जाती रही हैं, जिनमें हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी शिक्षण की संस्थाएं अथवा हिंदी भाषा का राष्ट्रीय स्वरूप, हिंदी साहित्य एवं प्रादेशिक साहित्य की विभिन्न विषयों की तुलना आदि विषय होते रहे हैं। इन गोष्ठियों के विवरण को पुस्तिकाकार में प्रकाशित किया गया है। यह विशिष्ट सामग्री है।

इस लेखक का संबंध इस संस्था के आरंभ के समय से ही नही, अपितु इसके पहले संचालित 'अखिल भारतीय हिंदी शिक्षण विद्यालय' से भी रहा है। 1952 में कांचीपुरम में हाईस्कूल में अध्यापक पद पर रहते हुए उक्त प्रशिक्षण संस्थान में अध्ययन हेतु चुना गया। उसके पश्चात 1961 में चेन्नई के प्रचलित कॉलेज में हिंदी विभाग में असिस्टैंट प्रोफेसर के पद पर रहते हुए हिंदी संस्थान में अध्यापक पद पर चयन किया गया। हिंदी संस्थान की विभिन्न गतिविधियों का दायित्व इसे दिया जाता रहा है। प्रयोजनमूलक हिंदी से संबद्ध कार्यों का संचालन, उसके सामग्री निर्माण विभाग के प्रभारी के रूप में योजनाओं का संचालन, पत्राचार पाठ्यक्रम का संचालन आदि का दायित्व इस लेखक को मिला था।

संस्थान के अध्यापकों के द्वारा लिखित शोध लेखों का प्रकाशन करने के लिए 'गवेषणा' त्रैमासिक शोध पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। आरंभ में उसका दायित्व इसी लेखक को दिया गया था। 'गवेषणा' के विभिन्न अंकों में कई बाहरी विद्वानों के भी लेख संकलित हैं। भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन, हिंदी साहित्य की प्राचीन एवं आधुनिक प्रवृत्तियों का विवेचन, शैली विज्ञान आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर लेख संकलित हैं।

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संस्थान के विद्यार्थियों के द्वारा लिखित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं तथा हिंदी से संबंद्ध लेख 'समन्वय' पत्रिका में प्रकाशित होता रहा है। यह वार्षिक अंक होता था। संस्थान में समय-समय पर हिंदी के प्रसिद्ध कवियों, विद्वानों और लेखक का आगमन होता रहा है। प्रसिद्ध कवियों की कविता पाठ को 'टेप रिकॉर्ड' करने की योजना बनायी गई थी। यह एक महत्वपूर्ण कार्य था।

डॉ. विनय मोहन शर्मा और डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा के निदेशकत्व में उपर्युक्त कई योजनाएं और कार्य सम्पन्न हुए, जिसके कारण हिंदी संस्थान की ख्याति राष्ट्रीय स्तर पर तथा अंतराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी। उनके पश्चात कई निदेशक आए और संस्थान की गतिविधियों में कई अंतर भी आते रहे। छोटे पौधे से बढ़कार संस्थान 50 वर्ष के वृक्ष के रूप में अभिवृद्ध हुआ है। इसकी और व्यापकता एवं उपयोगिता किस प्रकार की होगी, यह भविष्य में निहित है।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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