आशा का अनुबंध

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लेखक- डॉ. बी. रामसंजीवय्या
डॉ. बी. रामसंजीवय्या
केंद्रीय हिंदी संस्थान एक अद्वितीय शिक्षक महाविद्यालय के रूप में हिंदी प्रचार एवं प्रसार कार्य का केंद्र बिंदु रहा है। डॉ. मोटूरि सत्यनारायण के प्रयत्न से सन 1952-1953 में प्रारंभ होकर यह अखिल भारतीय विद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सन 1961 में केंद्रीय हिंदी शिक्षक महाविद्यालय के नाम से पंजीकृत इस संस्था ने कई हिंदी अध्यापको को प्रशिक्षण देने का स्तुत्य कार्य किया है। आरंभिक दिनों में डॉ. विनय मोहन शर्मा के नेतृत्व में एक साल तक संस्था का कार्य संपन्न हुआ। इसके बाद जब विनय मोहन शर्मा कुरूक्षेत्र विद्यालय में चले गए तो सन 1963 से डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा के निर्देश पर बहुमुखी विकास की ओर अग्रसर होता हुआ "स्वर्ण-जयंती" मना रहा है।
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यह संस्थान एक शैक्षणिक संस्था के रूप में आरंभ हुआ था, उससे अनुसंधान विभाग, प्रणाली विज्ञान, मनोविज्ञान विभाग, प्रयोजनमूलक हिंदी विभाग, साहित्य शिक्षण विभाग, विदेशियों के कार्यक्रम का विभाग आदि कई विभागों की स्थापना से एक बृहद संस्था का रूप ग्रहण कर चुका है और दूसरी स्वायत्त संस्थाओं के लिए एक आदर्शप्राय बना है। इस प्रकार इस संस्था का योगदान बहुमुखी है और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और प्रशिक्षण के क्षेत्र में विशेष महत्व प्राप्त कर चुका है। आज केंद्रीय हिंदी संस्थान स्वर्ण जयंती मना रहा है। इसकी गतिशीलता, प्रगति, उन्नति तथा अन्य संस्थाओं से इसकी समरसता को जो अनुभव कर चुके हैं, उनमें नई आशा की किरणें जगमगाती हैं। हिंदी प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में भविष्य में भी इस संस्था का योगदान अद्वितीय, अप्रतिम, अनमोल सिद्ध होगा। मेरी मंगल कामना है कि आगे भी इसका कार्य-विस्तार हो और इस संस्था की प्रगति के लिए प्रयत्नशील सभी व्यक्तियों को मेरा हार्दिक अभिनंदन।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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