इंद्रधनुषी स्मृतियाँ

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लेखक- डॉ. रश्मि दीक्षित

विदेशी पाठ्यक्रम में अध्यापन करते हुए जो अनुभव हुए, वे भी बहुत याद आते हैं। भारतीय मूल के छात्रों के अतिरिक्त अन्य देशों के विद्यार्थी भी गुरू के प्रति भारतीय व्यवहार से अनभिज्ञ उनका नाम लेकर संबोधन करते थे, पर कुछ ही दिनों में वे भारतीय विद्यार्थियों की तरह व्यवहार करने लगते। विदेशी छात्रों की अनवरत जिज्ञासा शिक्षकों को सदैव सतर्क किए रहती थी। वे ऐसे अद्भुत प्रश्न करते थे, जिसके लिए सदैव तैयार रहना पड़ता था। हिंदी फिल्मों को देखकर और गाने सुनकर उनकी प्रश्नावली बहुत लम्बी हो जाती। प्रश्न भी बहुत अटपटे होते। एक दिन पहले देखी गई फिल्म के "दीदी तेरा देवर दीवाना" का अर्थ समझने जब छात्र-छात्राओं का दल मेरे पास आया तो मैं बड़ी-उलझन में पड़ गई। दीवाना का अर्थ बताने से तो काम नहीं चल सकता था। इस एक पंक्ति का अर्थ समझाने के लिए उन्हें रिश्तों और उनके बीच व्यवहार की पूरी गाथा समझा कर ही अर्थ स्पष्ट कर सकी।

डॉ. रश्मि दीक्षित

देश के कोने-कोने से और सुदूर देशों से आए विद्यार्थियों के साथ मिले हुए अनुभव सेवानिवृत्ति के बाद भी याद आने पर आह्लाद से भर देते हैं। मैंने जब पहले-पहल संस्थान में प्रवेश किया था तो विद्यार्थियों के तरह-तरह के रूप-रंग, उनकी वेशभूषा, भाषा और तौर-तरीके बड़े ही विस्मयकारी लगे। एक स्थान पर दूसरे देश को देखना बहुत ही विमुग्धकारी था। जब भी किसी विशेष अवसर पर सभी छात्रों का दल अपने-अपने प्रदेश के वेश में बाहर निकलता था तो उस अद्भुत रंग-बिरंगी सेना को देखकर पास के गाँव की स्त्रियाँ कहती, "बहना मेरी, जा काँच वाले घर (संस्थान) में तरह-तरह की लुगाई रहवें।"

शिक्षा-जगत में सुदीर्घ अनुभव का गर्व था, अत: अध्यापन के बारे में किसी प्रकार की आशंका का प्रश्न ही नहीं उठता था। जब कक्षाओं में अध्यापन प्रारंभ किया तो समझ में आ गया कि यहाँ तो सर्वथा नवीन प्रणाली की आवश्यकता है। चतुर्थ वर्ष तथा विशेष गहन के विद्यार्थी जब कक्षा में ही चलने-फिरने लगते, गर्मी से परेशान होकर जब कमीज को कमर में फेंटे की तरह बाँध लेते और थोड़ा सा कठिन विषय होने पर बाल नोचने लगते तो अनुशासन के अभ्यस्त मन का उद्विग्न होना स्वाभाविक हो उठता। एक दिन पूर्वोत्तर का मेरा संगीत प्रेमी छात्र जब मुझसे 'गीदड़' माँगने आया, तब तो मेरी उलझन की सीमा ही नहीं रही। वह गिटार को गीदड़ कह रहा था। एक जिज्ञासु छात्र ने पूछा- "ताजमहल ने शाहजहाँ बनवाया था या शाहजहाँ ने ताजमहल?"

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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