ऋण समिति का गठन

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लेखक- डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा
डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा

संस्थान की पत्रिका 'गवेषणा' में छपे मेरे लेख में डॉ. धीरेंद्र वर्मा के एक कथन की आलोचना को तत्कालीन निदेशक के एक चाटुकार ने जब दिखाया तो निदेशक ने पत्रिका-सम्पादक डॉ. अय्यंगार को बुलाकर पूछा कि डॉ. शर्मा का यह लेख 'गवेषणा' में कैसे छप गया? निश्छल, परमहंस स्वभाव से धनी डॉ. अय्यंगार ने वह फाइल लाकर निदेशक को दिखा दी, जिसमें निदेशक की स्वीकृति के हस्ताक्षर थे, फिर भी निदेशक ने डॉ. साहब से व्यंग में कह ही दिया कि लगता है शर्मा ने तुम्हें चाय पिला दी होगी। जब ये सब बातें मुझे पता लगीं तो मैंने अपने मित्र डॉ. मो. मा. चौहान से कहा कि मैं ऐसे संस्थान में नहीं रहना चाहता, जहाँ का निदेशक चाटुकारों से घिरा रहता हो। डॉ. चौहान ने मुझे समझाया कि 'नहीं, तुम्हें ऐसे चाटुकारों और ऐसे वातावरण से जूझने के लिए यहाँ रुकना ही होगा। संस्थान में मुझे समय-समय पर जो भी कार्य दिये गए, मैंने उन्हें पूर्ण निष्ठा, तल्लीनता तथा अपनी क्षमता से पूरा किया। इस घटना के बाद कई महीने बाद तक मेरा और निदेशक का आमना-सामना ही नहीं हुआ। एक दिन किसी कार्यक्रम में मैं कमरे की सबसे पीछे की सीट पर बैठा था। ऊँचे मंच पर बैठे निदेशक महोदय ने अवश्य देख लिया होगा, किंतु कक्ष से बाहर निकलते समय उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा- अरे शर्मा, तुम कहाँ बैठे थे? मैंने भी उत्तर दिया- सर, पीछे की सीट पर ही तो था। 'अच्छा' कहकर वे चले गए और मेरे लिए एक मौन संदेश छोड़ गए- अधिकारी के साथ अनबन रखना या बोलचाल बंद रखना, एक अच्छे अध्यापक के लिए उचित नहीं है।

डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा ने द्वितीय भाषा-शिक्षण में उन्नयन के लिए प्रति वर्ष कई सेमीनार आयोजित किए। लोगों को कुछ नया लिखने के लिए प्रेरित किया। उनका सबसे बड़ा योगदान वर्तमान भवन की नींव के पत्थर के रूप में याद किया जाता रहेगा। एक दिन उन्होंने मुझे और डॉ. चौहान को अपने कक्ष में बुलाकर कहा- "हमारे चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के ज्यादातर कर्मचारी ऋण से ग्रस्त रहने के कारण पूरे मनोयोग और क्षमता से ड्रयूटी पूरी नहीं कर पाते, क्योंकि वेतन मिलने के साथ ही उन्हें लिए हुए ऋण की ब्याज चुकानी पड़ती है। वे हमेशा कर्ज़ में ही डूबे रहते हैं। आप दोनों उन्हें इस दयनीय स्थिति से छुटकारा दिलाने का प्रयास करें।" हम दोनों ने बड़ी दौड़-धूप करके संस्थान के कर्मचारियों के लिए पंजीकृत 'ऋण-समिति' का गठन कर लिया। ब्याजखोर कुछ अध्यापकों ने छिपे रूप में इसका विरोध भी किया। आज वही समिति जरूरतमंद कर्मचारियों को ढाई लाख रूपये तक का ऋण देने में सक्षम है। नये भवन में आने पर 1980 के बाद संस्थान कर्मचारी संघ की ओर से एक कैन्टीन भी कुछ वर्षों तक चलाई गई।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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