एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला

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लेखक- प्रो. ठाकुर दास
प्रो. ठाकुर दास

यह घटना सन 1968 की जनवरी की है। मैं अन दिनों 'वैज्ञानिक तकनीकी शब्दावली आयोग' में अनुसंधान सहायक के पद पर काम कर रहा था। आयोग के अनुवाद एजेंसियों के निरीक्षण के सिलसिले में इलाहबाद जाना पड़ा। विज्ञान परिषद, इलाहबाद विश्वविद्यालय, हिंदुस्तानी अकादमी के प्रतिनिधि रेलवे स्टेशन पर लेने आए हुए थे, और सभी ने मेरे ठहरने का प्रबंध भी कर रखा था। हिंदुस्तानी अकादमी के संयोजक पंडित उमा शंकर शुक्ल के पितृतुल्य आग्रह को मैं अस्वीकार न कर सका और मैंने उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। उन दिनों मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान में एम. लिट. की पढ़ाई कर रहा था।

फरवरी, 1970 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के वी. रा. जगन्नाथन तथा मा. मो. चौहान आगरा से लैक्चरर पद का आवेदन-पत्र लेकर आयोग में मेरे पास आए और मुझे आवेदन करने के लिए कहा। तब तक लगभग 12 वर्ष की मेरी सरकारी सेवा थी। खैर आवेदन तो कर दिया। इस बीच भाषा विज्ञान में मेरी एम. लिट. पूरी हो गई थी और मैंने पी. एच. डी. के लिए रजिस्टर करा लिया था। जगन्नाथन जी से मेरा परिचय सन 1967 में अन्नामलाई के समर स्कूल में हुआ था। उनसे मेरी मित्रता आज भी बरकरार है।

दूसरे दिन शुक्ल जी मुझे प्रख्यात भाषाविद डॉ. बाबूराम सक्सैना जी से मिलवाने के लिए ले गए। उनका नाम तो बहुत सुना था, उनकी पुस्तक सामान्य भाषा विज्ञान भी पढ़ी थी, किंतु व्यक्तिगत दर्शन करने का सौभाग्य शुक्ल जी के कारण ही मिल गया। फरवरी, 1968 में सक्सैना जी वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष बन गए। उनके कार्यकाल में मैं उनका कृपापात्र बना रहा। अनुसंधान सहायक के मामूली पद पर रहते हुए भी वे मुझे जब दौरे पर भेजते तो अध्यक्ष के प्रतिनिधि के रूप में ही भेजते। उनके प्रतिनिधि के रूप में मैंने निदेशक तथा मंत्री स्तरीय बैठकों में भाग लिया।

अगले दिन शुक्ल जी एक अन्य साहित्यिक विभूति के घर ले गए। उनका नाम था- श्री बालकृष्ण राव। उन्होंने भाषा विज्ञान के कई विषयों के बारे में मुझसे चर्चा की। ऐसे सुप्रसिद्ध साहित्यकार के दर्शन करके मैं धन्य हो गया। लौटते समय शुक्ल जी ने मुझे बताया कि राव साहब केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष हैं। बात आई-गई हो गई। मैं शब्दावली आयोग में काम करता रहा। अध्यक्ष के स्नेह-भाजन के कारण कई अधिकारियों की ईर्ष्या एवं कोप भी मुझे सहना पड़ा।

जुलाई, 1970 में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में लैक्चरर के पद के लिए साक्षात्कार पत्र मिला। मेरे हिसाब से साक्षात्कार सामान्य रहा। बहुत सरल से प्रश्न पूछे गए थे, इसी का आक्रोश था।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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