संस्थान - एक परिचय

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अध्याय-1
संस्थान - एक परिचय

स्थापना

15 मार्च, 1951 को हिंदी के प्रचार-प्रसार को व्यापक बनाने के उद्देश्य से भाषायी तथा सांस्कृतिक समस्याओं पर विस्तृत चर्चा के लिए देश के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद के मार्गदर्शन में दिल्ली के लालकिले में अखिल भारतीय संस्कृति सम्मेलन का आयोजन हुआ। जिसमें सर्वसम्मति से निश्चय किया गया कि संविधान में निर्दिष्ट हिंदी को प्रशासनिक-माध्यम तथा सामाजिक-संस्कृति की वाहिका के रूप में विकसित करने के लिए अखिल भारतीय स्तर की एक संस्था स्थापित की जाए। तद्नुसार मो. सत्यनारायण तथा अन्य हिंदी सेवियों के प्रयत्न से सन् 1952 में अखिल भारतीय हिंदी परिषद् की स्थापना आगरा में की गयी। पं. देवदूत विद्यार्थी संस्था के संचालक और श्री एम. सुब्रह्मण्यम् उनके सहायक थे।

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परिषद् ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अखिल भारतीय हिंदी महाविद्यालय की स्थापना की। महाविद्यालय के प्राचार्य के रूप में प्रो. सत्येन्द्र की नियुक्ति की गई। महाविद्यालय में हिंदीतर राज्यों के सेवारत हिंदी प्रचारकों को हिंदी वातावरण में रखकर उन्हें हिंदी शिक्षण का विशेष प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए हिंदी पारंगत पाठ्यक्रम प्रारंभ किया गया। भवन न होने के कारण प्रारंभ में शिक्षण कार्य नागरी प्रचारिणी सभा के भवन में शुरू हुआ और छात्रों के रहने का प्रबंध भी वहीं किया गया। आगरा विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सेवाभाव से महाविद्यालय में अध्यापन करते थे। बाद में तत्कालीन शिक्षा मंत्रालय के सचिव श्री रमाप्रसन्न नायक द्वारा महाविद्यालय का अनुदान स्वीकृत कराया। इसके बाद परिषद् और महाविद्यालय विजय नगर कॉलोनी में किराए के भवन में कार्यरत हुए।

1959 में महाविद्यालय के वार्षिक समारोह में राज्य-सभा के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्री एस.वी.कृष्णमूर्ति ने अपने अध्यक्षीय भाषण में परिषद् के कार्यो की प्रशंसा की और उसे राष्ट्रीय शिक्षा का गुरूकुल बताते हुए कहा कि इस संस्थान को देश की शिक्षा व्यवस्था में महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने ही तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री श्री के.एल.श्रीमाली को इस संस्था के विकास की सलाह दी।

19 मार्च, 1960 को शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने केंद्रीय हिंदी शिक्षण महाविद्यालय की स्थापना की ओर उसके संचालन के लिए केंद्रीय शिक्षण मंडल नाम से एक स्वायत्त संस्था का गठन किया।

केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल का पंजीकरण 1 नवंबर, 1960 को हुआ। केंद्रीय हिंदी मंडल के प्रथम अध्यक्ष श्री मो. सत्यनारायण मनोनीत किए गए। 30 अप्रैल, 1961 को केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल की बैठक में निर्णय किया गया कि अखिल भारतीय हिंदी शिक्षण महाविद्यालय में हाईस्कूल, हायर सैकेण्डरी स्कूल और कॉलेजों तथा प्रशिक्षण-महाविद्यालयों के अध्यापकों के लिए तीन पाठ्यक्रम 1. हिंदी शिक्षण प्रवीण, 2. हिंदी शिक्षण पारंगत और 3. हिंदी शिक्षण निष्णात संचालित किए जाएं। साथ ही महाविद्यालय के निदेशक की नियुक्ति के लिए प्रस्ताव पारित किया। मई, 1962 में महाविद्यालय के प्रथम निदेशक के रूप में डॉ. विनय मोहन शर्मा की नियुक्ति हुई।


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विहंगावलोकन अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम पृष्ठ संख्या
1. आमुख 3
2. अनुक्रमणिका 4
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान के पचास वर्ष 7
4. संस्थान एक परिचय 17
5. नये युग में प्रवेश 25
6. शिक्षण कार्यक्रम 29
6. शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम 34
7. शोध और सामग्री निर्माण 38
8. संस्थान प्रकाशन 41
9. प्रसार कार्यक्रम 44
10. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका 49
11. आधारिक संरचनाएँ 53
12. स्वर्ण जयंती वर्ष : कुछ नए संकल्प 56
13. संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली 61
14. हैदराबाद 70
15. गुवाहाटी 75
16. शिलांग 78
17. दीमापुर 82
18. मैसूर 84
19. भुवनेश्वर 87
20. अहमदाबाद 90
वैयक्तिक औज़ार

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