संस्थान - एक परिचय 2

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इसी वर्ष श्री मो. सत्यनारायण के स्थान पर श्री बालकृष्ण राव को मण्डल का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। इस बीच डॉ. विनय मोहन शर्मा ने निदेशक पद से त्याग पत्र दे दिया और फरवरी, 1963 में महाविद्यालय के निदेशक के रूप में डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा की नियुक्ति हुई।

सन् 1963 में केंद्रीय हिंदी शिक्षण महाविद्यालय का नाम केंद्रीय हिंदी संस्थान कर दिया गया।

विकास की ओर

1963 में प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा ने विविध रूपों में हिंदी के शिक्षण को भाषा विज्ञान, मनोविज्ञान और शिक्षाशास्त्र की आधुनिक दृष्टि से पुनर्विचार कर प्रवीण, पारंगत और निष्णात पाठ्यक्रमों को नया रूप प्रदान किया, जिससे ये पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक और प्रभावशाली बन गए।

संस्थान के पाठ्यक्रमों के आधुनिकीकरण के पश्चात इन पाठ्यक्रमों को मान्यता दिलाने के लिए केंद्र और राज्यों के शिक्षा विभागों से पत्र-व्यवहार किया गया। 1965 के आते-आते शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार और अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा हिंदी शिक्षण निष्णात (एम.एड़.समकक्ष), हिंदी शिक्षण पारंगत (बी.एड़/बी.टी.समकक्ष) और हिंदी शिक्षण प्रवीण (एच.टी.सी/डी.एड़.समकक्ष) मान्यता प्रदान की गई। फलस्वरूप हिंदी प्रचारकों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सेवारत अप्रशिक्षित हिंन्दी अध्यापकों की प्रतिनियुक्तियां इन पाठ्यक्रमों में होने लगीं।

संस्थान ने 1963-64 में दो अनुसंधान सहायकों की नियुक्ति कर हिंदी शिक्षण की प्राविधियों के विकास, हिंदी भाषा और साहित्य का उच्चतर अध्ययन और हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं और साहित्यों के साथ तुलनात्मक और व्यतिरेकी अध्ययन से संबंधित क्षेत्रों में मूलभूत और अनुप्रयुक्त अनुसंधान का कार्य प्रारंभ किया तथा अनुसंधान परियोजनाओं पर कार्य करने के लिए संस्थान के अध्यापकों को भी प्रेरित किया गया। निष्णात के छात्रों के पाठ्यक्रम में भी लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया। प्रमुखत: हिंदी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन, ध्वनि-विज्ञान और ध्वनि- शिक्षण, हिंदी-लिपि और वर्तनी, व्याकरण ओर संरचना, शब्द विज्ञान, भाखा-शिक्षण और प्राविधियों इत्यादि से संबंधित विषयों पर अनुसंधान कार्य प्रारंभ किया गया।

1964-65 से सत्र 1969-70 तक अनुसंधान सहायकों और अध्यापकों द्वारा 24 अनुसंधान परियोजनाएं पूरी की गयीं। निष्णात के छात्रों द्वारा भी इस अवधि में 71 लघु शोध प्रबंध प्रस्तुत किए गए। संस्थान ने इस अवधि में 8 अनुसंधान कार्यो को प्रकाशित भी किया।

अनुसंधान आधारित शिक्षण सामग्री निर्माण के क्षेत्र में भी संस्थान ने अपने सीमित साधनों से कार्य प्रारंभ किया। 1964-65 में हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के लिए हिंदी पाठ्य पुस्तकों का निर्माण करने की परियोजना के अन्तर्गत तमिल और तेलगु भाषी बच्चों के लिए हिंदी रीडर तैयार किए गए। 1965 से 1970 के मध्य सामग्री-निर्माण कार्यक्रम में हिंदीतर भाषा-भाषी बच्चों के लिए लिपि और वर्तनी के पाठों का निर्माण किया गया। हिंदी के व्याकरणिक लिंग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अभ्यास पाठ तैयार किए गए। अन्य भाषा के संदर्भ में हिंदी ध्वनि शिक्षण के अनुस्तरित पाठ भी तैयार हुए। इस अवधि में संस्थान ने अपने प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में उपयोग के लिए भी मध्यकालीन काव्य-संग्रह और आधुनिक काव्य-संग्रह भी तैयार किए।


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विहंगावलोकन अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम पृष्ठ संख्या
1. आमुख 3
2. अनुक्रमणिका 4
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान के पचास वर्ष 7
4. संस्थान एक परिचय 17
5. नये युग में प्रवेश 25
6. शिक्षण कार्यक्रम 29
6. शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम 34
7. शोध और सामग्री निर्माण 38
8. संस्थान प्रकाशन 41
9. प्रसार कार्यक्रम 44
10. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका 49
11. आधारिक संरचनाएँ 53
12. स्वर्ण जयंती वर्ष : कुछ नए संकल्प 56
13. संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली 61
14. हैदराबाद 70
15. गुवाहाटी 75
16. शिलांग 78
17. दीमापुर 82
18. मैसूर 84
19. भुवनेश्वर 87
20. अहमदाबाद 90
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