एक विहंगावलोकन पृ-24

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


Khs-logo-001.png

अखिल भारतीय कार्यक्षेत्र

संस्थान के तीन केंद्र - दिल्ली, हैदराबाद और शिलांग अपने-अपने क्षेत्रों में हिंदी भाषा के शिक्षण और अधिगम के स्तर को सुधारने के कार्यक्रमों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के हिंदी शिक्षकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। असम सरकार की मांग पर शिलांग केंद्र को गुवाहाटी में 1979 में स्थानांतरित किया गया, परंतु अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों की मांग पर पुन: संस्थान ने शिलांग में एक नए केंद्र की स्थापना की। इसी तरह दक्षिण भारत में संस्थान के कार्यक्रमों को और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने के लिए मैसूर में एक नया केंद्र 1988 में स्थापित किया गया।

इसी प्रकार अगस्त, 2003 में नागालैंड सरकार के विशेष आग्रह पर दीमापुर में संस्थान के एक केंद्र की स्थापना की गई तथा 2004 में एवं 2006 में क्रमश: भुवनेश्वर और अहमदाबाद में संस्थान के एक-एक केंद्र की स्थापना की गई। इस प्रकार संस्थान के मुख्यालय के अतिरिक्त आठ केंद्र कार्य कर रहे हैं।

संस्थान अपनी मूल संकल्पना के अनुरूप अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी भाषा के अध्ययन-अध्यापन के सभी पक्षों पर शोध विकास और प्रचार-प्रसार का कार्य कर रहा है।


अंतर्राष्ट्रीय भाषा हिंदी

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के महत्व को जानकर अनेक राष्ट्र अपने-अपने विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण और अनुसंधान के कार्य करते आ रहे हैं, परंतु 70 के दशक में भारत सरकार की विदेशों में हिंदी का प्रचार की योजना के परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण और अनुसंधान के कार्यों का महत्व और अधिक हो गया, जिसके कारण अनेक विदेशी विद्वान और शिक्षार्थी भारत आने लगे और संस्थान के सहयोग से अपने-अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण और मार्ग-दर्शन प्राप्त करते रहे हैं।

भारत सरकार की विदेशों में हिंदी प्रचार की योजना के अंतर्गत श्रीलंका और नेपाल में हिंदी पुस्तकालयों की स्थापना की गई और प्रत्येक वर्ष हिंदी के नवीन प्रकाशनों को इन पुस्तकालयों में खरीद कर भेजा जाता था। संस्थान द्वारा श्रीलंका में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, कोलबों में हिंदी शिक्षण के कार्यक्रमों में सहायता प्रदान की जाती रही है, सम्प्रति श्रीलंका में संस्थान के शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं और उनकी परीक्षाओं का आयोजन संस्थान द्वारा ही होता है।

इसी प्रकार अफगानिस्तान में हिंदी शिक्षण के कार्यक्रमों को चलाने में संस्थान की प्रमुख भूमिका रही है। 2006-07 में संस्थान के निदेशक प्रो. शंभुनाथ साव और प्रो. रामवीर सिंह ने काबुल की यात्रा की और वहां के विश्वविद्यालयों के लिए स्नातक स्तर पर हिंदी शिक्षण के लिए पाठ्यक्रम का निर्माण किया। वर्ष 2007 से 2009 तक डॉ. कृष्ण गोपाल कपूर ने नंगरहार विश्वविद्यालय, काबुल में हिंदी और अंग्रेजी का अध्यापन किया और फेकल्टी डीन हिंदी के रूप में कार्य करते हुए शिक्षण-सामग्री का निर्माण तथा पश्तों-हिंदी व्यतिरेकी अध्ययन तथा शब्द-कोश आदि तैयार किए।

विदेशों में हिंदी प्रचार की योजना के अंतर्गत ही भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा समय-समय पर विदेशों में हिंदी शिक्षण के लिए हिंदी प्राध्यापक प्रतिनियुक्त किए जाते हैं। इस योजना के अंतर्गत 1975 से अब तक संस्थान के 37 (सैंतीस) प्राध्यापक विदेशों में हिंदी शिक्षण का कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में तीन प्राध्यापक चीन, स्पेन और तुर्की में कार्यरत हैं।


पीछे जाएँ
23
केंद्रीय हिंदी संस्थान
24
स्वर्ण जयंती 2011
25
आगे जाएँ


विहंगावलोकन अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम पृष्ठ संख्या
1. आमुख 3
2. अनुक्रमणिका 4
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान के पचास वर्ष 7
4. संस्थान एक परिचय 17
5. नये युग में प्रवेश 25
6. शिक्षण कार्यक्रम 29
6. शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम 34
7. शोध और सामग्री निर्माण 38
8. संस्थान प्रकाशन 41
9. प्रसार कार्यक्रम 44
10. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका 49
11. आधारिक संरचनाएँ 53
12. स्वर्ण जयंती वर्ष : कुछ नए संकल्प 56
13. संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली 61
14. हैदराबाद 70
15. गुवाहाटी 75
16. शिलांग 78
17. दीमापुर 82
18. मैसूर 84
19. भुवनेश्वर 87
20. अहमदाबाद 90
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता