एक विहंगावलोकन पृ-25

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अध्याय-2
नये युग की ओर


स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी का प्रचार राष्ट्र के एकीकरण और राष्ट्र की अभिव्यक्ति का एक अनिवार्य साधन था। प्रश्न यह था कि अखिल भारतीय स्तर पर सभी इस महायज्ञ से जुड़ें और हिंदी की ज्योति जलाते चलें। भाषा शिक्षण की स्तरीयता की अपेक्षा व्यापक प्रसार को महत्व दिया गया था।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत हिंदी भाषा के अध्यापन को व्यवस्थित रूप से आयोजित करने का प्रश्न उठा, तो बी.एड़. आदि प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अन्य विषयों की तरह हिंदी के प्रशिक्षण को भी जोड़ा गया। आयोजकों के ध्यान में यह बात अवश्य रही कि भाषा का अर्जन अपनी प्रकृति में अन्य विषयों से भिन्न है और भाषा शिक्षण का आयोजन अपने लक्ष्यों के संदर्भ में विशिष्ट प्रविधि की मांग करता है।

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विधि की खोज

संस्थान का इतिहास भाषा विज्ञान और उस पर आधारित भाषा शिक्षण के विभिन्न युगों से मेल खाता है। 1963 में स्व. ब्रजेश्वर वर्मा के निदेशकत्व में संस्थान के पाठ्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्याप्त भाषा विज्ञान की नयी मान्यताओं के संदर्भ में पुनर्गठित किए गए।

उस समय तक संरचनात्मक भाषा शिक्षण का वर्चस्व था। मौखिक भाषा पर बल, मौखिक अभ्यास द्वारा भाषा का अर्जन, अर्जन के लिए दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग आदि नयी तकनीकें, नये विचार और नयी दृष्टि पाठ्यचर्या विकास के प्रेरणा स्त्रोत रहे। संस्थान ने 1965 में पारंगत, प्रवीण आदि प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को नयी मान्यताओं के संदर्भ में नया स्वरूप प्रदान किया।

उस समय यह अनुभव किया गया था कि इस युग परिवर्तन में इस क्षेत्र से जुड़े विद्वानों का सहयोग और परामर्श प्राप्त किया जाए। इसी आवश्यकता के चलते 1965 में भाषा शिक्षण और भाषा विज्ञान विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के प्रमुख भाषा वैज्ञानिकों और भाषा शिक्षणविदों ने भाग लिया। यह संगोष्ठी नए युग का सूत्रपात करती है।

उस समय यह भी अनुभव किया गया कि भाषा शिक्षण का क्षेत्र वास्तव में भाषा, साहित्य और मनोविज्ञान इन चारों विषय क्षेत्रों के समन्वित ज्ञान का उपयोग करता है। इन सब विषय क्षेत्रों को न केवल पाठ्यक्रमों में उचित स्थान दिया गया, साथ ही इनमें शोध, संगोष्ठियों, प्रकाशन आदि का सिलसिला शुरू किया गया। संबंधित विभागों का गठन किया गया और विभागों के प्राध्यापकों से अपने-अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ ज्ञान प्राप्त करने और शोध कार्य करने की अपेक्षा की गयी। यह भी अनुभव किया गया कि अन्य भाषाओं के साथ व्यतिरेकी विश्लेषण के कार्य हिंदी शिक्षण को वैज्ञानिक बनाने के लिए अत्यन्त उपादेय है।


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केंद्रीय हिंदी संस्थान
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विहंगावलोकन अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम पृष्ठ संख्या
1. आमुख 3
2. अनुक्रमणिका 4
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान के पचास वर्ष 7
4. संस्थान एक परिचय 17
5. नये युग में प्रवेश 25
6. शिक्षण कार्यक्रम 29
6. शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम 34
7. शोध और सामग्री निर्माण 38
8. संस्थान प्रकाशन 41
9. प्रसार कार्यक्रम 44
10. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका 49
11. आधारिक संरचनाएँ 53
12. स्वर्ण जयंती वर्ष : कुछ नए संकल्प 56
13. संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली 61
14. हैदराबाद 70
15. गुवाहाटी 75
16. शिलांग 78
17. दीमापुर 82
18. मैसूर 84
19. भुवनेश्वर 87
20. अहमदाबाद 90
वैयक्तिक औज़ार

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