एक विहंगावलोकन पृ-28

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भारत सरकार ने 1983-84 में अपनी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों के शैक्षिक विकास पर बल दिया और इसी परिप्रेक्ष्य में संस्थान को जनजातीय अध्ययन की परियोजना सौंपी गई। तदनुसार संस्थान ने 1983-84 में जनजातीय भाषा एवं अनुसंधान और शिक्षण सामग्री निर्माण एकक की स्थापना की।

शिक्षण में नव प्रवर्तन : प्रयोजनमूलक दृष्टि

स्व. मोटूरि सत्यनारायण जी 1972 में फिर केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के अध्यक्ष बनकर आए। बदलते युग की प्रवृत्तियों के संदर्भ में आपने संस्थान की नयी भूमिकाओं का अवदान किया और पाठ्यक्रमों में परिवर्तन के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने।

पदभार ग्रहण करने के साथ ही आपने संस्थान के माध्यम से प्रयोजनमूलक भाषा शिक्षण का मुहिम चला दिया। इस तरह आपने संस्थान की गतिविधियों को नई दिशा दी, नई दृष्टि दी। प्रयोजनमूलक शिक्षण आँधी की तरह देश के समस्त भागों में फैलता चला गया। हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों के विकास पर कार्य शुरू हुए। आज विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रयोजनमूलक शिक्षण को उच्च शिक्षा में एक आवश्यक विकल्प के रूप में स्वीकार करता है। देश में दिल्ली, पुणे, हैदराबाद, लखनऊ आदि कई विश्वविद्यालयों में नए ढंग के, व्यवसायोन्मुख तथा प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों का विकास किया गया है। इस प्रबल धार के उत्स के रूप में मोटूरी सत्यनारायण की सोच तथा संकल्प शक्ति है।

नया उजाला, नया सवेरा

भाषा से संबंधित शिक्षण कार्यक्रमों में नयी दिशाएँ खुल रही हैं और नयी दृष्टियाँ सामने आ रही हैं। पहले ही भाषा शिक्षण में दृश्य-श्रव्य सामग्री के उपयोग पर बल दिया जाता रहा है। आज कंप्यूटर ने वाक् और दृश्य के साथ परस्परता की भी सुविधा प्रदान की है। कंप्यूटर ने अपनी व्यापक पहुँच के कारण दूर शिक्षण के दो लाभों को भी अपने में समेट लिया है, छात्र या अध्येता संसार में कहीं भी हों, नेट पर उपलब्ध पाठ्यक्रमों का उपयोग कर सकते हैं। कंप्यूटर की परस्परता के गुण के कारण स्तरीय अध्ययन और विश्वसनीय प्रमाणन संभव हो सका है।

केंद्रीय हिंदी संस्थान ने आज कंप्यूटर युग में भाषा के कार्यक्रमों के क्षेत्र में पर्दापण किया है। कंप्यूटर संसाधिक अध्ययन, भाषा साहित्य के सी.डी. का निर्माण कार्य, हिंदी कार्पोरा के निर्माण का अनुसंधान कार्य आदि नयी संभावनाओं के परिचायक हैं।


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विहंगावलोकन अनुक्रम
क्रमांक लेख का नाम पृष्ठ संख्या
1. आमुख 3
2. अनुक्रमणिका 4
3. केंद्रीय हिंदी संस्थान के पचास वर्ष 7
4. संस्थान एक परिचय 17
5. नये युग में प्रवेश 25
6. शिक्षण कार्यक्रम 29
6. शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम 34
7. शोध और सामग्री निर्माण 38
8. संस्थान प्रकाशन 41
9. प्रसार कार्यक्रम 44
10. हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका 49
11. आधारिक संरचनाएँ 53
12. स्वर्ण जयंती वर्ष : कुछ नए संकल्प 56
13. संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र दिल्ली 61
14. हैदराबाद 70
15. गुवाहाटी 75
16. शिलांग 78
17. दीमापुर 82
18. मैसूर 84
19. भुवनेश्वर 87
20. अहमदाबाद 90
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