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लेखक- प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी


दिल्ली केंद्र के प्रभारी के रूप में कार्य करते समय एक प्रेस वार्ता हुई। केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के अध्यक्ष माननीय ललिते वर प्रसाद शाही, मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री ने, संस्थान की रजत जयंती समारोह की आयोजन समिति गठित कर मुझे सदस्य और सचिव भी नियुक्त किया। मैंने अपने केंद्र के सभी सहयोगियों के सहयोग से संस्थान की रजत जयंती समारोह का आयोजन किया, जिसका उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के कर कमलों द्वारा विज्ञान भवन के सभागार में किया गया था। उद्घाटन समारोह के अवसर पर ही स्व. राजीव गांधी ने 'हिंदी सेवी सम्मान योजना' का सुभारंभ किया था। उन्हीं के कर कमलों से रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में 25 हिंदी सेवी विद्वानों का सम्मान भी किया गया था। और उसके बाद आज तक हिंदी सेवी देशी-विदेशी विद्वानों को प्रतिवर्ष सम्मानित किया जा रहा है।


संस्थान में 1982 में मेरा चयन प्रोफेसर के पद पर हुआ था। तब मैं राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान के समाज विज्ञान और मानविकी शिक्षा विभाग की भाषा अनुसंधान प्रकोष्ठ में रीडर के पद पर कार्य कर रहा था, परंतु मैं संस्थान के क्रिया कलापों से पूर्व परिचित ही नहीं, अपितु 1964-65 से उसके अनेक शैक्षिक कार्यक्रमों से जुड़ा रहा हूँ। अत: मुझे संस्थान में प्रोफेसर के रूप में प्रवेश करते समय किसी भी प्रकार का संकोच या भय नहीं था।

संयोग से मैंने संस्थान के दिल्ली केंद्र में कार्यभार ग्रहण किया था, उस समय मेरे पुरातन मित्र और सहकर्मी प्रो. वी. रा. जगन्नाथन केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक थे, मुझे उनके साथ काम करने में विशेष प्रसन्नता इसलिए हुई थी कि मैं केंद्र की प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त था। केंद्र के विदेशी छात्रों के पाठ्यक्रमों और सांयकालीन पाठ्यक्रमों में शिक्षण कार्य कर रहा था। उन्हीं दिनों मैंने भारत में बहुभाषिकता के संदर्भ में हिंदी अनुवाद की समस्याओं पर एक संगोष्ठी का आयोजन भी किया था, जिसमें पढ़े गए सभी प्रपत्र बाद में संस्थान की ओर से पुस्तक के रूप में प्रकाशति भी हुए।

परंतु कुछ ही समय बाद प्रो. जगन्नाथन जी का स्थानातंरण हैदराबाद केंद्र में कर दिया गया और मुझे दिल्ली केंद्र का क्षेत्रीय निदेशक बना दिया गया। दिल्ली केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक के रूप में मैंने सर्वप्रथम केंद्र की प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन किए और रा. शै. अ. प्र. परिषद (एन. सी. ई. आर. टी) के अनुभवों के परिप्रेक्ष्य में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के पाठ्यक्रमों और सांयकालीन पाठ्यक्रमों पर पुर्नविचार कर उन्हें नया रूप प्रदान किया, जो लगभग उसी रूप में आज भी चल रहें हैं।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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