कुल 365 दिन

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लेखक- डॉ. ऋषि भूषण चौबे
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संस्थान में मुझे भी काम करने और पढ़ने का मौका मिला। सम्पूर्णता में, यह परिघटना मेरे लिए एक सुखद अनुभव है। संस्थान के दिल्ली केंद्र में विदेशी विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ाने का काम मुझे दिया गया था। मैंने इस काम को मन से किया। मैं अंतर्राष्ट्रीय नागरिक हो गया हूँ। मेरी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक जिम्मेदारी बढ़ गयी है। दुनिया के सामने मुझे अपनी और अपनी संस्कृति की ईमानदार छवि प्रस्तुत करने की कठिन चुनौती है। ऐसे में, विद्यार्थियों की संतुष्टि ही इसकी एकमात्र कसौटी बनी हुई थी। इस प्रक्रिया में हर रोज प्रयोग करने एवं सीखने की आदत लग गयी थी, जो आज तक फायदेमंद बनी हुई है। कुल मिलाकर कहें, तो खुद को ज्यादा पढ़ाना पड़ता था, उन्हें पढ़ाने से पहले। तत्कालीन वरिष्ठ प्रोफेसरों का तब मुझे बहुत सहयोग मिला। प्रो. जैसवाल (तत्कालीन क्षेत्रीय निदेशक) प्रो. रवि प्रकाश गुप्त, प्रो. भरत सिंह, डॉ. मंजु राय और डॉ. अपर्णा जी के अनुभवों / सलाहों ने बहुत मदद पहुँचायी। कक्षा में विद्यार्थी समय का अधिकाधिक सदुपयोग चाहते थे। अपनी मुश्किलें कहने में उन्हें थोड़ा भी संकोच नहीं होता था। मैं व्यक्तिगत रूप से इस स्थिति से खुश था, क्योंकि मेरा अपना मूल्यांकन भी साथ-साथ होता जा रहा था। विशेषकर कोरिया और चीन के विद्यार्थियों ने बहुत स्नेह और आदर दिया। कुछ छात्र-छात्राओं का व्यवहार तो बिल्कुल अविस्मरणीय है। हालांकि उनमें से कुछ लोगों का ही नाम याद हैं। इसलिए मैं यहाँ नामों का उल्लेख करने में संकोच कर रहाँ हूँ। फिर भी जो नाम फिलहाल जेहन में आ रहे हैं, वे हैं- यूलीन, आई, हुआलीयूँ, बोता, गुलनुरा, मिर्का, दरोता, पार्क, वोल्गा, मेरिको, यूनजुंगनो, दंगयासान, ल्यूजनान और किम।

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संस्थान द्वारा संचालित नवीकरण पाठ्यक्रम अपने आप मे सबसे अलग और एक अति उपयोग कोशिश है। मुझे भी अहिंदी भाषी राज्यों के माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षकों के बीच जाकर काम करने का मौका मिला। इस कार्य हेतु मुझे पंजाब के फिरोजपुर और जम्मू एण्ड कश्मीर के जम्मू शहर में भेजा गया था। मेरे साथ समन्वयक के रूप में क्रमश: प्रो. भरत सिंह और डॉ. मंजु राय थीं। आप दोनों ने मेरे प्रति यथेष्ट आत्मीयता एवं सहयोग धर्मिता का परिचय दिया। ये कार्यक्रम 20 दिन के होते हैं। हर दिन एक नई ऊर्जा और अनुभव के साथ बीतता था। उनमें से ज्यादातर अध्यापक / अध्यापिकाएँ (प्रतिभागी) मुझसे बड़ी ही थीं। बावजूद इसके, उनके सम्मान, सहयोग एवं जानने की चाहत ने मुझे अपनी राह चलने में आसान कर दिया। दोनों नवीकरण मेरे लिए एक रोचक एवं यादगार अनुभव रहे हैं। हर एक प्रतिभागी को मैं आजीवन पहचान सकता हूँ। इतनी निकटता महज 15-20 दिनों में हो गई थी। उन्हें इस मौके पर याद करते हुए बहुत ही अच्छा लग रहा है। यूँ तो मैं संस्थान नहीं छोड़ना चाहता था, पर रुकना मेरे वश की बात भी नहीं थी। अनुबंध पर मिली जीवन की पहली नौकरी अंतत: छूट ही गई। पर जो भी अनुभव मिला, वह एक थाती है। स्वयं मेरे लिए और इस तरह अपने देश के लिए भी। इस अवसर पर मुझे संस्थान में काम करने लायक समझने और इसका मौका देने वाले तत्कालीन (2008-2009) निदेशक प्रो. शंभुनाथ जी की याद आना स्वाभाविक है। मैं उनके प्रति हार्दिक आभार प्रकट करते हुए संस्थान की नई ऊँचाइयों की कामना करता हूँ। अंत में, मैं केंद्र के अन्य सभी शैक्षणिक एवं प्रशासनिक सदस्यों द्वारा मिले सहयोग एवं आदर के प्रति अपना आभार प्रकट करते हुए सुखद एवं अच्छे भविष्य की दुआ करता हूँ।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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