गवेषणा 2011 पृ-105

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हिंदी को लेकर यद्यपि इस तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जाती रही हैं कि विश्व बाजार और भूमंडलीकरण के कारण हिंदी का मूल संसार शायद और सिमटेगा, परन्तु आँकड़ों और अब तक हुए बदलावों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि हिंदी बाजार से बेदखल होगी। निश्चित ही इस दौर में बाजार पूरी तरह हिंदी की गिरफ्त में है। और उल्लेखनीय पहलू यह है कि हिंदी का दबदबा बाजार में वर्चस्व के नाते नहीं बल्कि लोकोपयोगिता के कारण है। वैश्वीकरण में आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से हिंदी की भूमिका बढ़ी है। जैसे–जैसे सीमाएं टूट रही हैं, प्रतिबंध समाप्त हो रहे हैं, दुनिया सिमट रही है, कारोबारी निकटता आ रही है, वैसे–वैसे एक नई संस्कृति विकसित हो रही है। यह नई बाजार संस्कृति अब तक स्वायत्त रहे समाजों और संस्कृतियों के रहन–सहन, आचार–विचार, भाषा–भूषा और मूल्यबोध सभी का अपने तरीके से अनुकूलन कर रही है। संचार माध्यम इस संस्कृति के वाहन बने हैं और हिंदी माध्यम। आंकड़े बताते हैं कि 100 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस राष्ट्र में 20 करोड़ से अधिक लोगों की मातृभाषा हिंदी है। 30 करोड़ से अधिक लोग इस भाषा का प्रयोग दूसरी भाषा के रूप में करते हैं, और लगभग 25 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका किसी न किसी रूप में हिंदी भाषा के साथ सरोकार जुड़ा हुआ है। कहने का आशय यह है कि देश की आबादी के लगभग तीन चौथाई से अधिक लोगों में हिंदी संपर्क का माध्यम है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार संस्कृति के लिए हिंदी सबसे अनुकूल भाषा के रूप में अपनाई जा रही है। इससे हिंदी का विकास–विस्तार तो हो ही रहा है, संपूर्ण राष्ट्र में भाषिक संपन्नता की परिचय भी मिल रहा है। और हिंदी की स्वीकृति का भी। आज तकरीबन सत्तर प्रतिशत से अधिक वस्तुएं हिंदी के माध्यम से जनमानस तक पहुँच रही हैं। विक्रेता और क्रेता के बीच हिंदी सेतु का कार्य कर रही है, चाहे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पाद हों, चाहे देशी कंपनियों के।

बेशक, हिंदी की शक्ति के नाते ही अमेरीकी सरकार हो या ‘कम्प्यूटर किंग’ बिल गेट्स, हिंदी के उपयोग में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया को यह भलीभांति पता है कि लगभग 40 करोड़ की आबादी वाले भारतीय मध्यवर्गीय बाजार तक पहुँच बनानी है तो हिंदी को अपनाना होगा। यह वैश्वीकरण का ही दबाव है कि यू.एन.ओ. में हिंदी की चर्चा हो रही है, विश्व की प्रमुख भाषाओं में शुमार करने की ठोस दलीलें दी जा रही हैं। कहना न होगा, मारीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन होना राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई विशेष उपलब्धि नहीं है परन्तु न्यूयॉर्क में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन निश्चय ही एक ऐतिहासिक परिवर्तन की आहट है, हिंदी की स्वीकृति का सकारात्मक पहलू है। विश्व समुदाय को पता लग चुका है कि भारत की प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का आधार क्या है और इस विकास की प्रक्रिया में शामिल होने का द्वार क्या है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, गत दिनों मीडिया में हुए दो प्रयोग। छोटे पर्दे और बड़े पर्दे दोनों पर हुए निम्न दो प्रयोगों से हिंदी की स्थिति का जायजा लगाया जा सकता है। रूपर्ट मडोंक जब छोटे पर्दे पर स्टार टी.वी. को लेकर आये तो जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि अंग्रेजी के माध्यम से कितना भी बढ़िया ‘प्रोग्राम’ और प्रसारण हो, मात्र शहरी वर्ग तक ही पहुँचा जा सकता है, वह भी ‘इलीट क्लास’ तक। जबकि हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित किया जाये तो एक विशाल दर्शक वर्ग तक पहुँचा जा सकता है। परिणामस्वरूप स्टार टी.वी. ने हिंदी में कार्यक्रम बनाने-दिखाने शुरू किए और नतीजा समाने है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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