गवेषणा 2011 पृ-107

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सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप

एल. सुनीता बाय


भाषा संस्कृति का दर्पण है और इसमें संस्कृति का प्रतिबिंब उभरता है। किसी भी भाषा को देखकर उसकी संस्कृति का अनुमान लगाया जा सकता है। वैसे भारतीय संस्कृति धर्म–दर्शन–प्रधान मानी जाती है। इसलिए भारतीय भाषाओं में धार्मिक शब्द प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के सांस्कृतिक प्रभाव को शताब्दियों से ग्रहण करता रहा है तो उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों की बाढ़ ही आ जाती है। जहाँ तक हिंदी का संबंध है, यह सोलहों आने सत्य साबित होता है। संस्कृति वही है जिस चेतना द्वारा जीवन के समग्र व्यापारों का संचालन होता है। प्राचीन और अर्वाचीन के भेद से मुक्त होकर निरन्तर गतिशील बना रहना, यही उच्च संस्कृति का लक्षण है। जो भाषा संस्कृति का यह स्वरूप सार्थक बनाती है वह उच्चता का प्रतीक बन जाती है। हिंदी के पक्ष में कहें तो प्रारंभ से आज तक यह भाषा ऐसी ही एक गतिशील संस्कृति को प्रतिबिंबित करती आ रही है। तभी तो वह आज भारत की राष्ट्रभाषा बन सकी है। फलदायकत्व जितना जिस संस्कृति में होता है उतना ही वह भाषा को प्रतिबिंबित करती है। जीवन की उन्नति तथा विकास के लिए अनूकूल वातावरण इससे बन जाता है। भारतीय संस्कृति में यही होता आ रहा है। इस संस्कृति के अनंतकालीन प्रयास की परिणाम है कि यहाँ भाषाएँ मानव की जीवन–शक्ति के साथ निरंतर गतिशील बनती रही है। हिंदी इसका अपवाद नहीं है। लोकहितकारी तत्वों की संयोजना की प्रतिबिंब हिंदी भाषा की और एक विशेषता रही है। लोक कल्याण भारतीय समाज की सांस्कृतिक सजावट है और हिंदी के साथ–साथ भारतीय भाषाओं में यह प्राणदायिनी शक्ति रही हे। तभी तो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ विश्वमैत्री की भावना से परिपुष्ट मानी जाती है। ये भाषाएँ प्रेम की भाषा बोलती हैं। कबीर, रहीम, तुलसी और रसखान ने इसी प्रेम का उल्लेख किया है। कबीर ने कहा है कि प्रेम के ढाई अक्षर किसी को भी पंडित बना देते हैं। जायसी इसी का समर्थन करते हुए कहते हैं–

तुर्की अरबी हिंदवी भाषा जेती आहिं
जाने मारग प्रेम का सबै सराहै ताहिं



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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