गवेषणा 2011 पृ-108

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तुलसी का मत है कि का भाखा का संस्कृत प्रेम चाहिए साँच। भाषा कोई भी हो, कोई फरक नहीं पड़ता। सच्चे प्रेम का चित्रण ही उसको महान बना देता है। भारत जैस बहुभाषाभाषी देश में जहाँ पर कई संस्कृतियों का मेल रहा है प्रेम के बिना कोई काम नहीं चल सकता। तभी तो भाषा की समस्या को समझ–बूझकर दूरदर्शिता के साथ उसे दूर करने का प्रयास यहाँ पर पहले संस्कृत भाषा के जरिए और फिर हिंदी भाषा के जरिए होता रहा है। सर्वदेवनमस्कारं केशवं प्रति गच्छति कहकर सांस्कृतिक एकसूत्रता का परिचय देने वाली भारतीय संस्कृति से बढ़कर हिंदी भाषा किस संस्कृति का परिपोषण कर सकती है? यही इस भाषा का महत्व रहा है। यहाँ पर हिंदू मुस्लिम बन जाता है और मुस्लिम हिंदू। मनुष्य हो तो गोकुल गाँव के ग्वालों के साथ मिलकर रहना चाहिए (मानुस हों तो वही रसखानि फिरों मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन)। ये ही हिंदी के संस्कार रहे हैं।


सामासिक संस्कृति

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाओं की परिणति रही है। अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा अपनी महत्ता एवं विलक्षणता के लिए यह प्रसिद्ध है। हिंदी भाषा इसी संस्कृति की वाहिका रही है। वह आज भी इसी श्रेष्ठता को अपने में लेकर निरन्तर विकास के मार्ग पर गतिशील है। भारतीय संस्कृति का आधार शांति, अहिंसा और सत्य रहे हैं। यहाँ की भाषा जो पहले संस्कृत के नाम से जानी जाती थी और आज उन्हीं संस्कारों को लेकर हिंदी के नाम से आगे की ओर बढ़ रही है। आज हम हिंदी में जो समन्वयात्मकता या सामासिक संस्कृति का स्वरूप देखते हैं वह चिरकाल के आदन–प्रदान की संश्लेषणात्मक प्रक्रिया का परिणाम है।

भारत की सांस्कृतिक समरसता ही इस देश की आत्मा रही है। भारत के दीर्घकालीन इतिहास के भिन्न–भिन्न कालों में यह आत्मा कई तरह से अपने अस्तित्व का विकास दिखाती रही है। इसकी अन्त: प्रेरणा हिंदी भाषा में भी देखी जा सकती है। यह समरसता विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, रीति–रिवाजों, सामाजिक संस्थाओं, उद्योग-धंधों, कलाओं ज्ञान–विज्ञान एवं दर्शन–शास्त्रों और सर्वोपरि इनमें व्याप्त भारतीय जीवन के भिन्न पक्षों में व्यक्त हुई है। इस भाषा में भारतीय जीवन की जय और पराजय देखी जा सकती है। हिंदू–मुस्लिम संस्कृति का विकास–क्रम, इनके बीच का संपर्क उदाहरण के रूप में चित्रित किया जा सकता है। इस इतिहास के दर्शन हिंदी भाषा की सांस्कृतिक सत्ता मे देखे जा सकते हैं। दक्खिनी हिंदी का रूप इसका उत्तम प्रमाण माना जा सकता है। आठवीं शताब्दी से शुरू होकर आज तक यह सांस्कृतिक समरसता बनी हुई है। हिंदी की विभिन्न संज्ञाएँ जैसे हिंदवी, हिंदुई, रेख्ता और रेख्ती दक्खिनी, गूजरी, खड़ी बोली, हिंदुस्तानी, इसी समरसता को दिखाने वाली संज्ञाएँ रही हैं। यह सार्वदेशिक भाषा रही है और भारतीय संस्कृति के सामासिक स्वरूप का सुन्दर प्रतिफलन करती है। शताब्दियों पूर्व की भावना, विचारणा, जीवन–प्रणाली आदि से होकर ही इसने मूलभूत सूत्र विकसित किए हैं। भारत के उच्चतर मूल्यों संबंधी साधना जैसे सर्वे सुखिन: सन्तु, परोपकारार्थमिदं शरीरम्, वसुधैव कुटुम्बकम् सदृश अमृतोक्तियों द्वारा इस भाषा ने सर्वकल्याण की इच्छा की है। विविधता में विद्यमान संस्कारों का संरक्षण करने में यह भाषा अत्यधिक सचेष्ट रही है। आज राष्ट्रभाषा के रूप में सुदूर दक्षिण के हिंदमहासागर के तटवर्ती प्रदेशों से लेकर हिमालय की उपत्यका तक वह भारत की महान सांस्कृतिक परंपरा को लेकर चलती है, उसका संबंध अपनी सहवर्तिनी आर्यभाषाओं से और यही नहीं दूरवर्ती अन्य भाषा परिवारों से भी रहा है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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