गवेषणा 2011 पृ-112

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राजभाषा हिंदी का ऐसा विकास हो जो समस्त देश में प्रयुक्त हो सके। राजभाषा के रूप में प्रशासकीय पत्र व्यवहार, प्रशासकीय रिपोर्ट, सरकारी प्रस्ताव, संसदीय विधियाँ, संधिपत्र, कारनामे, विदेशी राज्यों, उनके राजदूतों तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ पत्र व्यवहार, अन्तर्राजनैतिक तथा वाणिज्य के अधिकारियों तथा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के भारतीय प्रतिनिधियों के लिए जारी किए जाने वाले लेख सब हिंदी में हों। हिंदी के दो रूप होंगे–
  1. संघीय
  2. प्रादेशिक

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच में साहित्य का आदान–प्रदान भी होगा। राजभाषा हिंदी के विकास में सभी भारतीय भाषाओं का सहयोग अपेक्षित एवं वांछनीय है। हिंदी के राष्ट्रीय स्वरूप का महत्व इसी में है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को भी अपने में आत्मसात् करे। अखिल भारतीय स्वरूप

किसी भी समुदाय की भाषा, उस समुदाय के संस्कृतिपरक तत्व जैसे आचार–विचार, रीतिरिवाज़ आदि मे सहज ही प्रस्फुटित व प्रतिबिंबित होती है। हिंदी की सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत में यह भाषा बोलने वालों की संख्या बहुत अधिक है। हिंदी भाषी जनसमूह का गठन, उसकी जातीय भाषा का विकास, सांस्कृतिक अभ्युत्थान, साहित्य की प्रगति भारत की प्रगति की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा सकती है। इन विशेषताओं के फलस्वरूप हिंदी सारे देश की प्रगति एवं सांस्कृतिक विकास की कड़ी के रूप में काम करने में सक्षम रही है। इस भाषा का एक विलक्षण आत्मविश्वास रहा है। गहरे धार्मिक संस्कार के बीच भी वह लौकिक जनमात्र को प्रमुखता देकर आगे बड़ी है। भारत भर में होने वाले सांस्कृतिक विकास को और चिन्तन की नई प्रवृत्तियों को इसने आगे बढ़ाया है और समस्त देश में वितरित किया। इस प्रकार यह भाषा भारतीय संस्कृति की समग्रता की वाणी बनी। भारतीय चेतना के प्रसार में उसने योग दिया और भारतीय प्रतिभा की उपलब्धियों को मान दिया। आज भी बोलने वालों के सामाजिक स्तर विशेष के परिवर्तन के साथ हिंदी कई रूप ग्रहण करती है। उसकी व्यापकता के माने नहीं हैं। वह समस्त भारत में फैली पड़ी है। भाषावैज्ञानिक एवं भाषावैज्ञानिकेतर कई कारण, राजनैतिक दांवपेंच आदि से प्रभावित होकर हिंदी अपने कई सांस्कृतिक रूपों को लेकर आगे बढ़ी है। उसके कई स्तर ऐसे हैं कि निम्नतम से उच्चतम तक वह विभिन्न बोलियों की श्रंखला बनाती रही है। स्थानीय, जनपदीय, ग्रामीण न जाने हिंदी के कितने–कितने रूप हमारे सामने हैं। इनके अतिरिक्त उपप्रादेशिक बोलियों का प्रभाव भी हिंदी पर सहजता से मिलता है।

संस्कृति एवं भाषा वैविध्य से युक्त एक देश होने के नाते भारत में कई भाषाओं और सभ्यताओं की प्रगति हुई। वैविध्य को कायम करके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक दिशाओं में प्रगति कैसे हो सकती है– यह हिंदी ने दिखा दिया। संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ने यह मसला सहजता के साथ हल किया। इसी को पहचानकर गांधी जी ने हिंदी प्रचार को स्वतंत्रता संग्राम का एक अभिन्न कार्यक्रम भी बनाया। राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा से लेकर प्रांतीय भाषाओं के स्तर तक हिंदी का कार्यक्षेत्र रहा। प्रांतीय भाषाओं से मिलकर हिंदी आज अखिल भारतीय भाषा बन गई है। भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के विकास के लिए हिंदी के जरिए भारतीय भाषाओं का परस्पर आदान–प्रदान आज की मूल आवश्यकता बन गई है और हिंदी ही एक ऐसी भाषा रही है जिसमें इसकी ताकत रही है। प्रांतीय भाषाओं से हिंदी में और हिंदी से प्रांतीय भाषाओं में अनुवाद कार्य करते हुए एक दूसरे की सभ्यता, रहन–सहन, और संस्कृति से परिचित कराकर, आपसी सौहार्द बढ़ाकर मानवता के विकास के निरंतर प्रयत्न होते रहे हैं। आज के युग में हिंदी इस मूल्यवान कार्य में सहयोग दे रही है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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