गवेषणा 2011 पृ-121

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भाषा और जन–विसर्जन

लालसा लाल तरंग


सामाजिक परिवर्तन और विकास प्रत्येक स्थिति में चीजों का, इसलिए भावों और विचारों का तथा उसकी अभिव्यक्ति का स्वरूप बदलता है, यह स्वरूप एक विशिष्ट और एक अर्थ में सीमित दायरे का निर्माण करता है। सामाजिक विकास की विभिन्न अवस्थाओं में संप्रेषण के माध्यमों में भी नए परिवर्तन होते रहते हैं। ‘सामाजिक परिवर्तन’ का आर्थिक परिवर्तन की दिशाओं में अनिवार्य संबंध होता है, इसलिए ‘भाषायी सृजनशीलता’ इस परिवर्तन से अनिवार्यत: संबंध रखती है। जब भी सामाजिक रूप बदलते हैं, तब–तब विचारधारात्मक संप्रेषणों के रूपों का निर्माण करते हैं। यह ध्यातव्य है कि भाषा का जन्म संप्रेषण के माध्यम के रूप में ही हुआ, चाहे उसे व्यक्त करने के रूप किसी भी तरह के रहे हों। संकेतों में प्रतिबिंबित भाषा के प्रारंभिक रूप भी संप्रेषण के माध्यम ही हैं। एहसास के कंपन जो गोलाई या लकीरों में ढलकर अक्षर बन जाते हैं, भाषा के निर्माण के आधार होते हैं। इसलिए समाज के एहसास की सच्ची और सार्थक अभिव्यक्ति भाषा में ही हो सकती है। डॉ. रामविलास शर्मा का मानना है कि ‘‘इतिहास का निर्माण शताब्दियों के अनुसार नहीं होता। सामाजिक और आर्थिक विकास के नियमों के अनुसार होता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में, वास्तव में उसके अन्तिम चरण में पंजीवाद के रूप में बहुत परिवर्तन हुए।’’ उनका मानना था कि ‘‘भाषा मनुष्य के आपसी व्यवहार का मुख्य साधन है। शब्दों को नकारने का, भाषा को नकारने का, मतलब है कि मानवीय संबंधों का नकारना।............ वास्तव में मनुष्य संगठित होकर अपना भाग्य बदले, इसके लिए वे भाषा का ही व्यवहार करेंगे और इसलिए ये तमाम पूंजीवाद के समर्थक भाषा पर ही प्रहार करते हैं और उसे निरर्थक और व्यर्थ बताते हैं।’’ मनुष्य में इच्छा भी है और उसे रूप देने का सामर्थ्य भी। यही एक ऐसी बात है जिसने मनुष्य को संसार का अप्रतिद्वंद्वी जीव बना दिया है।

लेकिन एक बार भाषा के एक रूप ग्रहण करने के बाद उसके कई रूप बन जाते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा, साहित्यिक भाषा या रचना– भाषा में अंतर होता है लेकिन यह अंतर इतना नहीं होता कि भाषा की पूरी अस्मिता ही बदल जाय।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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