गवेषणा 2011 पृ-125

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यह भी द्रष्टव्य है कि आज अनेक ऐसे शब्द हिंदी भाषा में शामिल हो गए हैं, जिनका मूल किसी अन्य भाषा में है, लेकिन वे आम भाषा में घुलमिल गए हैं। चाय, चीनी भाषा का शब्द है, रेल, प्लेटफारम, सिगनल, स्टेशन, मेमो, रिक्शा, बस, जीप, मोटर, वकील, फाइल, नोटिस ऐसे हजारों शब्द हैं, जो दूसरी भाषाओं से आए हैं परन्तु हमारी भाषा में विसर्जित हो गए हैं। और इनका प्रयोग अब अपना प्रयोग हो गया है। अत्यल्प लोग जाते हैं कि ये शब्द मूल रूप से किस भाषा के हैं। लक्ष्मीशंकर वार्ष्णेय लिखते हैं ‘यदि इतिहास के सुदीर्घ काल मे ध्वनि प्रणाली स्थायी रही है तो वास्तव में उसका कारण यह है कि इतिहास के आदिकाल में ही परिवर्तनशील सिद्धांतों को ग्रहण या समन्वित कर लिया गया था।’ (भारतीय आर्यभाषा, ल.श. वार्ष्णेय, पृ. 103) जाहिर है कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से भी ध्वनि, स्वर और व्यंजन में भी परिवर्तन आने का कारण भी भाषा के प्रयोग द्वारा शब्दों का समन्वयन ही मूल में रहा है, जो आज भी है। आज भारतवर्ष में भारतीय भाषाओं के अनेक शब्द हिंदी में और भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, अवधी तमाम भाषाओं में अन्य भाषाओं के समज्जित होने के प्रमाण मिलते हैं। यू.पी., बिहार तथा अन्य प्रदेशों के लोग, मजदूर और कर्मचारी जब दिल्ली में रह जाते हैं तो उनकी भाषा दिल्ली की हो जाती है। अर्थात् लोक और मजदूर, किसान वर्ग के लिए जिस भाषा की जरूरत मुगलकाल में थी और उसके पहले भी थी, वह भाषा वस्तुत: हिंदी, उर्दू, ब्रजभाषा की मिली–जुली भाषा थी। प्रेमचंद ने भी ‘जान गिलक्राइस्ट’ की स्थापनाओं से अलग जाकर उनके विपरित हिंद प्रदेश में बोलचाल की भाषा ‘हिन्दी–उर्दू’ को एक ही भाषा माना है। बल्कि हर प्रदेश में आम व्यक्ति और मजदूर वहीं की बोलचाल की भाषा को ही प्राथमिकता देता है चाहे वह बिहार हो, उ.प्र. हो, बंगाल हो, गुजरात हो या कोई और जगह हो, मजदूर और आम लोग जो आम बोलचाल की भाषा ही प्रयोग करते हैं।

नजीर अकबरबादी ने भी सामान्य बोलचाल की भाषा को ही प्राथमिकता दी है और यह संकेत भी दिया है कि इसी भाषा को शहरी, ग्रामीण, बाजारू लोग और मजदूर वर्ग भी बोलते, प्रयोग करते हैं। क्योंकि भाषा उन्हीं में रची–बसी होती है। भाषा के प्रश्न पर यह देखा गया है कि समाज या राष्ट्रीय स्तर पर लोग हाशिए पर होते हैं– जैसे मजदूर, किसान और अन्य निम्नश्रेणी के लोग या जिन्हें ‘लोक’ की श्रेणी में रखा जाता है उनके जीवन और उनकी समस्याओं पर विभिन्न प्रकार के सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक परिवेश तथा दबाव के प्रभाव के कारण उनकी जिंदगी की सोच और संस्कृति कई स्तरों पर प्रभावित हो रही है। इसका सीधा और गहरा प्रभाव उनकी भाषा पर पड़ता है। बदलाव की इस प्रक्रिया में वही वर्ग अपनी एक अलग भाषा का निर्माण करता है जिसका स्पष्ट चित्र संघर्षों के बीच दिखता है क्योंकि भाषा केवल मानवीय भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं है, वह इनके बोध का माध्यम भी है। और तब वही भाषा ‘जन में विसर्जित’ हो जाती है। यह ऐतिहासिक तथ्य है।

भाषा ‘प्रयोग एवं प्रसार’ दोनों में मजदूरों के संगठन भी एक सक्रिय तत्व माने जाते हैं, जो आम मजदूरों, किसानों के बीच संपर्क स्थापन में अपनी प्रचलित भाषा का प्रयोग करते हैं। वर्ग संघर्ष की प्रक्रिया में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि जिस वर्ग का ये नेतृत्व करते हैं, वह वर्ग समाज और राष्ट्र के निर्माण में एक महत्वपूर्ण अंग होता है। GDH को KOLE को कोट किया जा सकता है, जिन्होंने मजदूरों को ‘महज नागरिक’ न मानकर, सिर्फ ‘उपभोक्ता’ न मानकर उन्हें ‘उत्पादक’ के रूप में देखा है और मजदूर–संघों को वर्ग–संघर्ष का अग्रिम दस्ता माना था। डॉ. मैनेजर पांडेय ने अंतोनियो ग्राम्शी को कोट करते हुए लिखा है- "भाषा एक साथ ही एक जीवित वस्तु भी है और जीवन तथा सभ्यता का अजायबघर भी। यथार्थवादी लेखकों के सामने भाषा के इन दोनों रूपों में से एक के चुनाव की समस्या होती है तथा इसी चुनाव पर यथार्थवाद की सफलता निर्भर होती है।"


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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