गवेषणा 2011 पृ-129

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हिंदी भाषा : वर्तमान परिदृश्य

सुनीता रानी घोष


हिंदी भाषा की एक लंबी संघर्ष–यात्रा रही है। आज भी हिंदी से जुड़े अनेक यक्ष प्रश्नों का समाधान अपेक्षित है, जैसे– हिंदी भाषा की आज क्या स्थिति है? सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा के रूप में हिंदी भाषा कितनी उपयुक्त है? देश में हिंदी भाषा का क्या स्थान है? अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हिंदी का प्रसार संतोषजनक है अथवा नहीं? हिंदी में अनुवाद की क्या स्थिति है? हिंदी भाषा कहाँ और किस रूप में होनी चाहिए? हिंदी भाषा का साहित्यिक रूप कैसा हो? मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी भाषा से क्या अपेक्षाएं हैं? संपर्क भाषा के रूप में तथा अध्ययन के माध्यम की भाषा के रूप में हिंदी भाषा के स्वरूप में क्या अंतर होना चाहिए? हिंदी भाषा के मानकीकरण को प्रभावी बनाने के लिए क्या प्रावधान होने चाहिए?

तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था, मीडिया के वर्चस्व, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण ने हिंदी के विकास में अहम भूमिका निभायी है। उदारीकरण ने हिंदी को बाजार की भाषा बनाया, क्योंकि विश्व के पूंजीवादी देशों की व्यावसायिक दृष्टि भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखती है और बाजार में मुनाफे के लिए हिंदी को बाजार की भाषा बनाना मजबूरी है। हिंदी के विस्तार का यही सबसे बड़ा व्यावसायिक कारण है। पिज्जा हो या बर्गर, बेचने के लिए हिंदी विज्ञापन का सहारा लेना ही पड़ता है। हिंदी के विस्तार एवं उसे लोकप्रिय बनाने में मीडिया तथा हिंदी फिल्मों का बहुत बड़ा हाथ है। विदेशी चैनलों को बहुत जल्दी यह आभास हो गया कि भारत में टेलीविजन पर केवल अंग्रेजी कार्यक्रम दिखाकर वे लाभ नहीं कमा सकते। फटाफट स्टार, जी टीवी सभी में हिंदी धारावाहिक तथा हिंदी समाचार बुलेटिन प्रस्तुत करने की होड़ लग गई। विदेशी फिल्में चाहे वे हॉलीवुड की अंग्रेजी फिल्में हों या जर्मन, फ्रैंच इत्यादि भाषा में निर्मित फिल्में, सभी हिंदी में डब होकर प्रस्तुत की जा रही हैं। सभी प्रकार के टी.वी. कार्यक्रमों में हिंदी का बोलबाला है अर्थात् टीआरपी बढ़ानी हो तो हिंदी धारावाहिक बनाने होंगे। एफ.एम. रेडियो ने खूब धूम मचायी। मीडिया तथा फिल्मों ने हिंदी भाषा के महत्व को बढ़ाया है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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