गवेषणा 2011 पृ-131

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सत्र 2010–2011 में इस कार्यक्रम के अंतर्गत सात भाषाएँ सम्मिलित की गयीं। इन सात भाषाओं में हिंदी भाषा के अध्ययन को भी सम्मिलित किया गया है। विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा हिंदी में साहित्य सृजन किया जा रहा है, जिसने प्रवासी साहित्य के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनायी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करना हिंदी की उत्कट जीवनी–शक्ति का परिचायक है, क्योंकि अपनी इस विकास यात्रा में हिंदी को किसी प्रकार की सरकारी सहायता या प्रोत्साहन प्राप्त नहीं हुआ है।

इस स्थिति तक पहुँचने के बाद भी हिंदी भाषा और उस भाषा में काम करने वाले उपेक्षित प्रतीत होते हैं। जब भी हिंदी की स्थिति का आकलन होता है, अंगेजी की उपस्थिति एवं अंग्रेजी से तुलना अनिवार्य–सी हो जाती है। हिंदी तथा अंग्रेजी दो भिन्न भाषाओं के नाम होते हुए भी विलोम शब्द की तरह प्रयुक्त होते हैं। अंग्रेजी के मोह एवं खौफ पर चर्चाएं एवं भाषण देने से बेहतर होगा कि हम उन कारणों का निष्पक्ष विवेचन करें जो अंग्रेजी की लोकप्रियता एवं हिंदी की उपेक्षा के मूल में है। निसंदेह हिंदी विकसित हुई है, लेकिन बाजार तथा संचार के कारण हिंदी बोलने वाले बढ़े हैं, किंतु पढ़ने-लिखने वाले कम हुए हैं। लोगों का मानना है कि हिंदी में रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं, फिर भी वह स्थिति नहीं है जो अंग्रेजी के साथ है कि केवल अंग्रेजी में भली प्रकार संवाद कर लेने पर ही रोजगार के अनेक अवसर उपलध होते हैं। इसी प्रकार चिकित्सा, विज्ञान एवं तकनीकी उच्च शिक्षा जो प्रत्यक्ष रोजगार एवं व्यवसाय से जुड़ी हुई है, केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। भाषा बेशक व्यक्ति के भाव एवं सहज विश्वास से जुड़ी होती है। अत: उससे लगाव स्वभाविक है, किंतु जीवन में व्यवहारिक स्तर पर बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हमें क्या और कितना हासिल हो रहा है। यही कारण है कि इस देश में हर वह व्यक्ति जो सत्ता के केंद्र में पहुँचना चाहता है एड़ी-चोटी का जोर लगाकर हिंदी सीखता हैं। हिंदी सीखने के बाद उसे लगता है अब दिल्ली दूर नहीं। वह चाहे दक्षिण के देवगौड़ा जी हों या सोनिया गांधी, राजनेताओं द्वारा हिंदी सीखी जाती है क्योंकि वह आम जनता की भाषा है और आम जनता के वोट जुटाने के लिए उनकी भाषा में बात करना अनिवार्य है। दूसरी तरफ हिंदी माध्यम के विद्यालयों में उन्हीं परिवारों के बालक पढ़ने जाते है जिनकी आर्थिक स्थिति कॉन्वेंट एवं पब्लिक स्कूलों की भारी-भरकम फीस अदा करने की नहीं है, क्योंकि यहाँ यह गणित लगाया जाता है कि हिंदी की शिक्षा से क्या हासिल होगा कुछ लोग तो हिंदी को ‘गरीबों की भाषा’ तक कहने का दुस्साहस करते देखे गये हैं। यहाँ तक कि हिंदी भाषा की चिंता में निमग्न रहने वाले, हिंदी के उत्थान पर व्याख्यान देने वाले, विभिन्न संस्थाओं में हिंदी दिवस पर मुख्य अतिथि की भूमिका का सफल निर्वाह करते हुए, राजभाषा हिंदी की विजय पताका फहराने की शपथ लेने वाले हिंदी के कितने प्रोफेसर अपने बच्चों को हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। बल्कि वे सभी अपने बालकों को अंग्रेजी में दक्ष देखना चाहते हैं। अफसोस होता है कि जब पब्लिक तथा कॉन्वेंट विद्यालयों में हिंदी भाषा में बात करने पर दंड दिया जाता है और माता-पिता उसका समर्थन करते हैं। जिन पब्लिक तथा कॉंन्वेंट स्कूलों में इस दंड का प्रावधान है उनके प्रति प्रशासन को कठोर कदम उठाना चाहिए।


आज भारत को विकास की गति को तीव्रतर करने के लिये विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन की अधिकाधिक आवश्यकता है। यदि हम भारत का भाषिक मानचित्र देखें तो केवल पाँच प्रतिशत भारतीय ऐसे हैं जो अंग्रेजी में दक्ष हैं, बीस प्रतिशत सप्रयास अंग्रेजी बोलते हैं, लिखते हैं, और रोजगार में अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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