गवेषणा 2011 पृ-140

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उच्चारणानुगामी वर्तनी में शब्द का जैसा उच्चारण किया गया है, ठीक वैसा ही लिखा जाता है, जैसे-आओ (आओ), बैठो (बैठो), खाना (खाना), खाओ (खाओ) देवनागरी में लिखित हिन्दी के अनेक शब्दों की वर्तनी ‘उच्चारणनुगामी’ है। सामान्यत: के शब्दों मे कोई भी बद्य अक्षर (Closd Syllalle) नहीं होता, जैसे-पिताजी, माता जी, नदी, दरी, चौथाई, हुआ था सालाना कमाई, दुहाई महाराजा जी की। कुछ शब्दों में व्यंजनान्त अक्षर आने के कारण देवनागरी लिपि के वर्णों के प्रकार्य मे द्वैधता देखी जा सकती है, जैसे-कल-काला-काली (1,1,,2,2 अक्षर), चॉंद-चॉंदनियाँ (1,2,3 अक्षर)

2. शब्द-सिद्धि -लगभग सभी भाषाओं में सामाजिक आदि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समय-समय पर नये शब्द गढ़े जाते रहते हैं या एकाधिक मूल या सिद्ध शब्दों को जोड़कर अथवा स्वकीय एवं परकीय शब्दों के योग गढ़ जिये जाते हैं, जैसे-शिक्षा-शिक्षालय-शिक्षार्थी, दूध-दूधवाला दुधारू सुनना-सुनाना-सुनाने वालो तुम-तुम्हारा-तुम्हारी-तुम्हारी-तुम्हारे-तुम्हारे वाला "वह-उस-उन-उन्हें-उन्होंने-उन्हीं, देश-देशी-अन्तर्देशीय; राष्ट्र-राष्ट्रपति- राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय; किताब-किताबघर आदि शब्द-सिद्ध के समय कभी-कभी मूल शब्द की वर्तनी में अन्तर आ जाता है, जैसे- मंत्री+मंडल = मन्त्रिमंडल; मन्त्री + आलय = मन्त्रालय; प्राणी + मात्र = प्राणिमात्र। इन शब्दों को स्रोतानुगामी वर्तनी के शब्द भी कहा जा सकता है।

स्वकीय तथा परकीय शब्दों और उन के योग से निर्मित शब्दों की लिखित वर्तनी का आधा रूप-प्रकिया रहे या उच्चारण, यह प्रश्न अभी भी एक समस्या बिन्दु बना हुआ है। ‘भाई’, चारपाई, पाई, जगहँसाई, खोई,(गन्ने की), हवाई बातें, आदि शब्दों की 'ई' के उच्चार में तथा गयी, नयी, भाषी, ‘यी’ के उच्चारण में हिंदी-भाषी कोई अन्तर नहीं करते। यही स्थिति 'ये', ए' के साथ हैं। ऐसी स्थिति में हिंदी का प्रयोग करने वाले कुमार, किशोर, निरक्षर, प्रौढ़ या हिन्दी पढ़ने वाले हिन्दी-इतर भाषी छात्रों के लिए 'क्रिया, संज्ञा, विशेषण, भूतकाल, पुल्लिंग, एकवचन, आदि तथ्यों का सही निर्णय करना कठिन रहता है। ऐसे शब्दों की मानक वर्तनी का आधार आज भी एक प्रश्न चिह्न बना हुआ है।

3.स्रोत - समान्यत: किसी भाषा की शब्दावली को स्रोत की दृष्टि से दो वर्गों में रखा जा सकता है-(1) स्वकीय शब्दावली, (11) परकीय शब्दावली। स्वकीय शब्दावली के दो वर्ग बनाए जा सकते हैं-(क) परम्परागत, (ख) निर्मित। इसी प्रकार परकीय शब्दावली के भी दो वर्ग बनाए जा सकते हैं - (अ) स्वदेशी (ब) विदेशी। स्वदेशी तथा विदेशी शब्दावली तत्सम तथा तत्समेतर हो सकती है। तत्सम वे शब्द होते हैं जिन में उच्चारण तथा अर्थ की दृष्टि से दोनों भाषाओं में कोई अन्तर नही होता, जैसे- पिता, आत्मा; सम्राट; भागीरथी; चपरासी; दीवानी; सिपाही; वतन; फिल्म; नेलपौलिश, प्लेग; रिक्शा; आदि। तत्समेतर शब्दों को कोई भाषा परकीय भाषा मे प्रचलित उच्चारण या अर्थ की दृष्टि से कुछ परिवर्तन के साथ ग्रहण कर लेती है, जैसे- जंघा, शीर्षक; पतंग; कटि; प्रान्त; परिवार; ऋषि; कृष्ण; सब्जी; मुर्गा; नजला बादाम; जनवरी; मई; अंडरवीयर; फ़ाउन्ड्री आदि

तत्सम शब्दों में अनेक शब्द ऐसे भीं है जो अर्थ की दृष्टि से तो तत्सम हैं, किन्तु उच्चरित तथा लिखित वर्तनी की दृष्टि से उन में कुछ अन्तर आ गया है, जैसे-रोजा (रोज़ा); फिल्म (फ़िल्म); नेलपालिस (नेलपॉलिस); फीस (फ़ी); आदि। वास्तव में हिन्दी में भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से तत्सम तथा तत्समेतर शब्दों के बारे में कोई शोध-कार्य ही नहीं पाया है। केवल संस्कृत भाषा से हिन्दी में आये कुछ शब्दों के बारे में तत्सम, तत्समेतर या तद्भव का वर्गीकरण किया जाता रहा है।



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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