गवेषणा 2011 पृ-147

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


(1) अनुस्वार - अनुनासिकता के लिए सिद्धान्तत: अलग-अलग चिह्न (ॱ ; ँ) स्वीकार किए गये हैं, किन्तु व्यवहार में अनुस्वार चिह्न का ही बोल-बाला है। यह चिह्न (क) अर्द्ध नासिक्य ध्वनियों के लिए; (ख)

य,र,व,ल,श,स,ह,क्ष,त्र,ज्ञ, वर्णों से पूर्व (ग) शिरोरेखा के ऊपर कोई अन्य चिह्न होने पर प्रयुक्त किया जा रहा है, यथा– (संवत, संरक्षण, संलाप, संवाद, अंश, संसार, संहार, संक्षिप्त संभास, संज्ञा); (पंक्ति, चंचल, पंडित, संत, पम्प); (पड्.क्ति, चंचल, पण्डित, सन्त, पम्प); (ईंट, बैंत, में, मैं, हैं, नौकरों, सरसों, कार्यों, सौंफ, सौंपना, औंधा)। आजकल वर्तनी-विद्रूपण इतना अधिक बढ़ गया है कि हिन्दी-भाषी क्षेत्र से प्रकाशित कई हिन्दी-समाचारपत्र पत्रिकाओं मे शिरोरेखा के ऊपर कोई चिह्न न होने पर भी आवश्यक “ ँ ” के स्थान पर का ही प्रयोग किया जाने लगा है, जैसे- अंगना आँगन; आंख; उंगली; ऊंट; कहां; यां; सांस; हां। इन के बदले होने चाहिए-अँगना/आँगन; आँख; उँगली ऊँट कहाँ; माँ; साँस; हाँ। इस विद्रूपण का परिहार अनुनासिकता-शून्य के स्थान पर एक लघु शून्य स्वीकार किया जा सकता था, किन्तु इतनी बड़ी समिति के अनुस्वार ( बिन्दु) तथा अनुनासिकता ( ँ चंद्रबिंदू) की अराजकता को समाप्त नहीं किया। जिन अहिन्दी भाषियों की मातृभाषाओं में अनुनासिकता का अभाव है, उन्हें इन चिह्नों के प्रयोग तथा वाचन में बहुत अधिक कटिनाई का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार अर्द्ध नासिक्य ध्वनियों के लिए सम्बन्ध वर्ण-चिह्नों का प्रयोग न कर सामान्यत: अनुस्वार चिह्न का ही प्रयोग करना भी वर्तनी विद्रूपण का कारण है। संख्या, पंक्ति, चंचला, कंज, पंडित, खंडन, संत, गांधी, कंपन खंभा, जैसे- शब्दों में एक ही शार्षोंपरिचिह्न ( बिन्दु) पाँच नासिक्य ध्वनियों का सूचक है। यह कैसा मानकीकरण! अम्मा, अन्न- जैसे शब्दों को हम 'अंमा, अंन' कैसे स्वीकार कर सकेंगे?

(2) लगभग 50 वर्ष पूर्व 'इ' के मात्रा चिह्न को सम्बद्ध व्यंजन के बाद लघु आकार देते हुए लगाने का आदेश निकला था, जिसे कुछ वर्षों के बाद वापस ले लिया गया, क्योंकि आरम्भिक कक्षाओं के छात्र ई इ के मात्रा चिह्नों में आकार की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं रख पाते थे। 1983 ई० वाली समिति ने 'इ' के मात्रा चिह्न को सम्बद्ध व्यंजन वर्ण से पूर्व लगभग ही स्वीकार किया था, जबकि अन्य स्वर वर्णों के मात्रा-चिह्न सम्बद्ध व्यंजन वर्ण के पश्चात् (ऊपर, नीचे, भी) रखे जाते हैं। यथा- कि, दिन-की, कुल कूल, थे, पैसा, तोड़ना, कौर) यदि समिति ने मलयालम लिपि में प्रयुक्त 'इ' के मात्रा चिह्न को हिन्दी के 'इ' वर्ण के मात्रा चिह्न के लिए अपना लिया होता तो यह चिह्न भी सम्बद्ध व्यंजन वर्ण/संयुक्ताक्षर के पश्चात् ही रखा जाता। उस स्थिति में हिन्दी के कुछ प्रोफेसर 'अदि्वीतीय; चिह्नित, बुद्घिमान' जैसे-शब्दों को अदि्वीतीय; चिहि्नत; बुदिमान जैसा लिखने का दुराग्रह न करते।

(3) देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण करने वाली समिति ने 'ऐ' औ, ( ो, ौ) के मूल स्वरत्व तथा संयुक्त स्वरत्व के रूप में कोई अन्तर नहीं रखा है, यथा- मैदान, है, ऐसा, कैसा, गवैया, सवैया, सुरैया, ततैया; औरत; नौकर; सौ; कौआ; उठौआ; चूल्हा, हौआ, आया एक ही चिह्न को दो प्रकार की ध्वनियों के लिए प्रयोग करना हिन्दी सीखने वाले छोटे बच्चों तथा हिन्दी-इतर भाषा-भाषियों को परेशानी में डाल देता है। देवनागरी की वैज्ञानिकता बनाए रखने के लिए किसी ऐसे चिह्न को स्वीकार किया जाना चाहिए था, जो संयुक्त स्वर बनाने मे सहायक रहता, जिससे अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं को भी देवनागरी में लिखते समय यथा सम्भव शुद्धता बनी रहती।


पीछे जाएँ
146
147
148
आगे जाएँ


गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता