गवेषणा 2011 पृ-158

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साहित्य-चिंतन


काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज

(हिंदी-तेलुगु स्वच्छंदतावादी कवियों के विशेष संदर्भ में)

आई.एन.चंद्रशेखर रेड्डी


विता सूक्ष्म शरीरी होती है। कविता मे कवि भाषा की किफायती से भाव सम्राज्य की स्थापना करता है। इसमें कवि के लिए कल्पना एक साधन है तो भाषा भी एक विशिष्ठ उपकरण है। भाषा कवि की अभिव्यक्ति-कुशलता का प्रभावी उपकरण भी है। कवि का संबंध पाठक से इसी भाषा पर आधारित होता है। कवि-भावों एवं विचारों की संप्रेषणीयता का सही एवं सक्षम उपकरण भी भाषा है। भाषा–संपदा कवि–प्रतिभा की पुश्तैनी संपदा है। काव्य भाषा अपने आप में संश्लिष्ट, संक्षिप्त एंव सौंदर्यमूलक होती है। उसे समझे बिना उसके स्वरूप से परिचय हुए बिना कविता को समझना असंभव है। कवि कविता में विशिष्ट भाषा प्रयोग द्वारा सांस्कृतिक अस्मिता की तलाश करता ही है और उसके अतिरिक्त अनजाने में ही सही, भाषायी अस्मिता की खोज भी करता है। जिससे कवियों के द्वारा प्रयुक्त भाषा की उन्नति होती है। उसमे सरल संप्रेषणीयता के लिए कवि अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक समृद्घि आती है। हिंदी और तेलुगु भाषाओं को परखने से आज उनमें जो समृद्घि दिखाई देती है वह पूर्व युगों के कवियों की अथक कोशिशों का परिणाम ही मान लेना उचित है। खासकर इस दिशा में हिंदी और तेलुगु के स्वच्छंदतावादी कवियों का विशेष प्रयास रहा है।

हिंदी और तेलुगु में लगभग एक ही समय स्वच्छंवादी कविता का उदय हुआ है। दोनों भाषाओं में इस आंदोलन का केंद्र एक ही रहा है। वह है यूरोपीय देशों में विकसित रोंमांटिसिज्म या काल्पनिकतावाद। काल्पनिकतावाद से प्रेरित काल्पनिक कविता से प्रभावित हिंदी और तेलुगु के स्वच्छंदतावादी कवियों ने इस बात को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकारा है। अंग्रेजी काल्पनिक कविता जितना अपने युगीन पृष्ठभूमि से निकट संबंध रखती है, उतनी हिंदी-तेलुगु स्वच्छंदतावादी कविता अपनी पृष्ठभूमि से नहीं है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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