गवेषणा 2011 पृ-161

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जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका छवि, अच्युत
देखते हुए निष्पलक, यदि आया उपवन
विदेश का प्रथम स्नेह का लतांतराल मिलन
नयनों का नयनों से गोपन-प्रिय संभाषण-
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान पतन-
कांपते हुए किसलय, झरते पराग समुदाय-
गाते खग नव जीवन परिचय, तरू मलय वलय।

इस उदाहरण में चित्रों की एक क्रमबद्घ श्रृंखला है। राम की मानसिकता को स्पष्ट करने के लिए कवि ने चित्रों में क्षिप्रता और एक प्रकार का ऐंद्रिय आवेग-सा भर दिया है। प्रत्येक बिंब पूरे अर्थ की, पृष्ठभूमि की और सजावट की संबद्घता में ही अपना अर्थ रखता है। इसमें खासकर अंधकार, विद्युत, उपवन, किसलय, पराग, खग, तरू-मलय वलय आदि शब्दों के प्रयोग से बिंब निर्माण किया गया है। ध्यान देने की बात है कि ये सभी शब्द तत्सम हैं। एक उदाहरण तेलुगु का देखा जा सकता है। इस बिंब को पकड़ना हिंदी जैसा नहीं है। 'किन्नेरसानि पाटलु' में विश्वनाथ सत्यनारायण जी ने किन्नेरसानि के प्रवाह के लिए एक बिंब का निर्माण किया है-

बंगारू तीगलो पानकम्मैपोय
कोब्बरिपालु वाकलकटि्टनट्लय्ये
वेय्यावुलोकसारि पिदिकिनट्लै पोये

अर्थात् स्वर्णिम तार में गुडरस जैसा हो गयी, नारियल का दूध जमा हुए जैसी हो गयी, हजार गाय एक ही बार दुहने जैसी हो गयी है। यानी उस रूप में किन्नेरसानि प्रवाहित हुई है। यहाँ किन्नेरसानि एक नदी है। काव्य नायिका है। वहाँ का पहाड़ नायक है। पहाड़ के पास प्रवाहित होने वाली नायिका का बिंब कवि ने इस रूप मे प्रस्तुत किया है, जो काफी संश्लिष्ट है।

बिंब कल्पना से निर्मित होता है। कल्पना भाषा के माध्यम से अभिव्यंजित होती है। निर्माण के संदर्भ में कल्पना के तीन रूप हैं-

  1. प्रत्यक्ष कल्पना
  2. स्मृति कल्पना
  3. कल्पित या ऊहाजनित कल्पना

प्रत्यक्ष कल्पना ऐंद्रिय अनुभव है। उसका संबंध यथार्थ से, बाहरी रूपविधान से है। नये ढंग से किसी आधार रहित वस्तु व्यापार को प्रस्तुत करना कल्पित कल्पना या ऊहाजनित कल्पना के अंतर्गत आता है। इन तीनों प्रकार के रूपविधान में भाषा प्रयोग का वैशिष्ट्य रहता है।

बिंब का स्वरूप विवादास्पद विषय है। वाक्य में उसका संबंध किसके साथ रहता है, यह भी विवाद का विषय है। साधारणतया वाक्य के तीन भाग होते हैं - संज्ञा, विशेषण और क्रिया, इनमें बिंब की स्थिति किसमें होती है, यह बहुत बड़ा सवाल है। वह संज्ञा, विशेषण और क्रिया किसी भी रूप में हो सकता है। फिर भी उसकी सत्ता प्रमुखत: विशेषण और क्रिया में बनी रहती है। कारण यही है कि वाक्य के वैशिष्ट्य को जितना विशेषण और क्रिया व्यंजित करती है, उतनी ही संज्ञा नहीं। क्रिया से बिंब की गत्यात्मकता स्फुट होती है और विशेषण से उसकी विलक्षणता तथा वैशिष्ट्य । कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं-

विशेषण-
दूर उन खेतों के उस पार
जहाँ तक गई नील झंकार!
नत नयनों से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर थर थर!


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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