गवेषणा 2011 पृ-169

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एक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद का लगभग आंतककारी प्रभाव हिंदी साहित्य में पिछले कई दशकों से अशोक वाजपेयी लक्षित करते आ रहे हैं। अत: वे साहित्य में एक तानाशाह और रूढ़ राजनीतिक-सामाजिक विचारधारा के रूप में प्रभावकारी मार्क्सवाद से तीव्र असहमति जताते हैं। इस प्रंसग में महेश दर्पण से संवाद करते हुए उनके एक प्रश्न के उत्तर में अशोक वाजपेयी कहते हैं, "मार्क्सवाद के ज्यादातर घपले सत्ता, साहित्य और कलाओं के क्षेत्र के घपले हैं। मार्क्सवाद ने मूल्य-व्यवस्था तो यह प्रतिपादन की, लेकिन मार्क्सवादियों ने (मेरा झगड़ा ज्यादात्तर हिंदी के मार्क्सवादियों से है) मेरे हिसाब से समाज की व्याख्या, सामाजिक यथार्थ की व्याख्या, इस व्याख्या को नियमित करने वाले तंत्र की स्थापना, आदि की, उन्होंने बहुत अनाचार और अत्याचार किया। मुझे नहीं लगता कि मार्क्सवाद को एक धर्म मानकर हम उसको जीवन के हर क्षेत्र में लागू कर सकते हैं।"[1]

हिंदी का तथाकथित प्रगतिशील लेखन अपनी तथाकथित सामाजिकता और जन-जिम्मेदारी का ढोल पीटते नहीं अघाता है। यह लेखन मार्क्सवाद का ही साहित्यिक संस्करण है, जो सदैव लेखकीय प्रतिबद्घता को आत्यंतित रचना और जीवन-मूल्य मानता है और वह भी अक्सर बाध्यकारी तरीके से। प्रतिबद्घता की यह अवधारणा मार्क्सवादी विचारधारा की वर्ग-संघर्ष की सैद्घांतिक की उपज है। सन् 1917 की रूस की अक्टूबर क्रांति के बाद मार्क्सवाद ने एक राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के रूप में नवगठित सोवियत संघ में जगह पायी। आगे चलकर इसी तर्ज पर पूर्वी यूरोप के अनेक छोटे-छोटे देशों में भी समाजवादी व्यवस्थाएँ निर्मित हुईं। दूसरे महायुद्घ (1939-1945) की समाप्ति के बाद समाजवादी और पूंजीवादी खेमों के बीच लगभग साढ़े चार दशक तक शीतयुद्घ का घमासान चला। इस 'लड़ाई' में सोवियत व्यवस्था समेत अनेक छोटी-छोटी समाजवादी राज्य-व्यवस्थाएँ भी धाराशाही हो गईं।

बीसवीं सदी की इस विशालकाय और ताकतभर राजनीति व्यवस्था ने पूरी दुनिया में साहित्य, कला, दर्शन, इतिहास, राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था को देखने की प़द्घतियों में क्रांतिकारी बदलाव ला दिये। साथ ही एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में मार्क्सवाद का आंतककारी प्रभाव भी दुनिया के सामने आया। यह विचारधारा दुनिया भर के साहित्य में से प्रतिबद्घता का नारा लेकर आई। हिंदी में सन् 1936 में प्रगतिशील आंदोलन के जन्म लेने के बाद से अब तक प्रगतिशीलता या प्रतिबद्घता साहित्य के स्वराज या स्वाययत्ता का प्रबल प्रतिपक्ष है। वाम प्रतिबद्घता का दबदबा हिंदी में अब सत्तर वर्ष पुराना हो गया है।

जाहिर है कि अशोक वाजपेयी की कविता के स्वराज की लड़ाई का एक बड़ा वाम विचारधारा और प्रतिबद्घता के विरूद्घ भी है। अशोक वाजपेयी ललित कीर्तिकेय को एक साक्षात्कार देते हुए उनके एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं, "हमारी बड़ी भारी बिडंबना है की प्रतिबद्घता के नाम पर एक अजीब किस्म का अपढ़ माहौल छा गया है। एक तरह की बेईमानी भी मान्यता पा गयी है। आपकी प्रतिबद्घता दुरूस्त हो तो बिना पढ़े काम चल सकता है। किसी विचार के प्रति आसक्ति या निष्ठा बिना उस विचार और उसके फलितार्थों से 'रिगर' के साथ उलझे कोई अर्थ नहीं रखती, न ही गहरी और सृजनक्षम हो सकती है। मार्क्सवाद को लेकर यही बेईमानी चल रही है।"[2]

रचना में प्रतिबद्घता चाहे मार्क्सवादी विचार-प्रणाली अथवा किसी अन्य राजनीतिक विचार-प्रणाली से हो अथवा धर्म, दर्शन, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, इतिहास आदि किसी अन्य अनुशासन की विचार और विधि दृष्टि से हो, वस्तुत: उनके प्रति रचना के प्रतिबद्घ होने का निहितार्थ यही है कि रचना उन तमाम ज्ञानानुशासनों के विचारों या विधि-दृष्टियों को अपने भीतर प्रविष्ट होने, अपने को प्रभावित-नियोजित करने और अतत: उन्हें अपना उपनिवेश बनाने देने का अवसर उपलब्ध करा रही है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ

टीका-टिप्पणी

  1. 'पांव भर जीरे में ब्रह्मभोज' में संकलित, पृ. 235-36
  2. वही, पृ. 142
वैयक्तिक औज़ार

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