गवेषणा 2011 पृ-17

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(ii) रोज ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए।
(iii) सुबह घूमने अवश्य ही जाना चाहिए।

उपर्युक्त वाक्यों को देखकर ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वाक्य किसी स्वास्थ्य अधिकारी अथवा डॉक्टर ने कहे हैं। इसी तरह से आपको आदेश दिया जाता है कि समय से कार्य समाप्त किया करें, तत्काल टिप्पणी प्रस्तुत करें।

इन वाक्यों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि ये वाक्य कर्यालयीन हिंदी के तथा किसी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा किसी कनिष्ट अधिकारी से कहे गये हैं। इस तरह का अनुमान आम बोलचाल की भाषा या साहित्यिक भाषा में लगाना संभव नहीं है।

3. प्रयोजनमूलक भाषा के प्रयोग-संदर्भ सुनिश्चित होते हैं। एक संदर्भ में प्रयुक्त होने वाली वाक्य संरचनाओ का प्रयोग यदि कोई व्यक्ति भिन्न संदर्भ में या बोलचाल की भाषा में करता है तो उसकी स्थिति हास्यास्पद हो सकती है। जैसे-आपको सूचित किया जाता है कि आप शीघ्र ही पूरे ऋण का भुगतान कर दें, आपको आदेश दिया जाता है कि आप समय से कार्यालय आया करें, यदि आपने आवेदन प्रस्तुत नहीं किया तो आपके विरूद्घ कार्रवाई की जाएगी। इस तरह के आदेशात्मक वाक्यों के प्रयोग 'प्रशासनिक या कार्यालयीन हिंदी' में देखने का खूब मिलते हैं। पंरतु यदि कोई व्यक्ति इसी तरह के आदेशात्मक वाक्यों का प्रयोग अपने घर में पत्नी के साथ करने लगे, जैसे-आपको सूचित किया जाता है कि रोज सुबह आठ बजे नाश्ता पेश किया करें तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस व्यक्ति की अपने घर में क्या दशा होगी।

4. प्रयोजनमूलक भाषा की प्रकृति औपचारिक होती है। जबकि आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग अनौपचारिक संदर्भों में किया जाता है। औपचारिक संदर्भों में प्रयुक्त होने के कारण यहाँ वाक्य संरचनाएँ रूढ़ हो जाती हैं। बोलचाल की भाषा में जो सहजता और लचीलापन दिखाई देता है वह प्रयोजनमूलक भाषा में नहीं मिलता। उदाहरण के लिए आम बोलचाल की भाषा में वक्ता तथा श्रोता परस्पर संबोधन करते समय आम, तुम या तू सर्वनामों में से किसी भी सर्वनाम का प्रयोग करते हुए इस प्रकार के वाक्यो का पयोग कर सकते हैं। जैसे-

(i) आप मेरे घर मत आइए। (औपचारिक)
(ii) तुम मेरे घर मत आना। (अनौपचारिक)
(iii) तू मेरे घर मत आना। (अनौपचारिक)

सामान्य भाषा के वार्तालाप मे तू, तुम तथा आप सर्वनामों का चयन श्रोता की अवस्था, पद, स्टेटस, घनिष्ठता, मन:स्थिति, पारस्परिक संबंध आदि के आधार पर किया जाता है, परंतु प्रयोजनमूलक भाषा में ये मानदंड काम में नही आते। यहाँ तो प्रत्येक स्थिति में एक वचन कर्ता के रूप मे आप सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।

औपचारिक रूप होने के कारण प्रयोजनमूलक भाषा वस्तुत: भाषा का 'लिखित रूप' रूप होती है।

सामान्य भाषा की तरह प्रयोजनमूलक भाषा का प्रयोग बोलचाल के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सीखने के लिए प्रयास करने और निरतंर अभ्यास की आवश्यकता होती है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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