गवेषणा 2011 पृ-170

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अब हम यहाँ कुछ प्रश्न लेते हैं-

क्या अशोक वाजपेयी के साहित्य के स्वराज की अवधारणा में दूसरी सभी अनुशासन दृष्टियों का प्रवेश सर्वथा वर्जित है? क्या उनका 'स्वराज' कुछ-कुछ गांधी के स्वराज की अवधारणा से भी जुड़ता है, जिसमें तब के एक कल्पित स्वतंत्र राष्ट्र की स्वायत्तता के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण विचार-सूत्र गांधी देते हैं? क्या अशोक वाजपेयी का अवधारणागत स्वराज हिंदी रचना जगत में एक पच्छन्न कलावाद के पुनरूत्थान का प्रयास है? उनके साहित्य के स्वराज के प्रधान उपादान कौन-कौन हैं? स्वराज-प्राप्त कविता जो कि राजनीति, समाज, इतिहास, दर्शन, धर्म, अर्थ, आदि अनुशासन दृष्टियों के वैचारिक आंतक से मुक्त है, उसके निजी विचार और अनुभूतिगत विषय क्या हैं या होंगे?

उपर्युक्त से पहला विचारणीय प्रश्न है कि क्या अशोक वाजपेयी के साहित्य के स्वराज की अवधारणा में अन्य अनुशासन दृष्टियों का प्रवेश वर्जित है, अगर नहीं तो साहित्य के स्वराज में उनकी क्या भूमिका है?

सबसे पहले हमें यह तथ्य जान लेना चाहिए कि अशोक वाजपेयी साहित्य के स्वराज को व्यक्ति के एंकातिक और आत्मीय अंतरंग के रूप में देखते हैं। सन् 1994 में दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान की प्राप्ति के अवसर पर स्वीकृति वक्तव्य देते हुए अशोक वाजपेयी ने कहा था, "आज कविता का बुनियादी संघर्ष उस निजता और अंतरंग को बचाने का है, जिसे सार्वजनिकता लीलने पर उतारू है।"[1] उसी अवसर पर उन्होने यह भी कहा था, "मैं कविता को महान लक्ष्यों, विचारधाराओं आदि का उपनिदेशक मानने के विरूद्घ रहा हूँ।"[2]

कविता की रचना में महान लक्ष्यों और विचारधाराओं की भूमिका आवश्यक नहीं, क्योंकि कविता मनुष्य का अपना एंकात है। अशोक वाजपेयी के अनुसार मनुष्य के निजी एंकात के लिए सार्वजनिक संसार, महान लक्ष्य और अन्यान्य अनुशासनों की विचार-दृष्टियाँ निरंतर आशंका पैदा करते खतरे हैं।

जहाँ तक अन्य अनुशासनों की विचार-दृष्टियाँ व्यक्ति के निजी एंकात को प्रभावित नहीं करने की कोशिश करतीं, वहां तक अशोक वाजपेयी को कविता के स्वराज में अन्य विचार-दृष्टियॉ और अनुशासनों के प्रवेश करने में हर्ज नही, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर वे विचारों की दृष्टि-बहुलता का प्रजातांत्रिक तरीके से कविता के स्वराज में समम्मान सहकार स्थापित करने का प्रस्ताव रखते हैं।

सन् 1995 में आयोजित अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में साहित्य के जनतांत्रिक रवैये पर अशोक वाजपेयी ने कहा, "साहित्य अपने स्वभाव से ही प्रजातांत्रिक और बहुलतावादी है- उसके पास एक नहीं, अनेक रास्ते हैं। वह दुनिया और आदमी को, संघर्ष और संबंध को, प्रकृति और मृत्यु को, किसी एक दृष्टि से देखने का आग्रह नहीं करता है उसका आग्रह अगर है तो इस पर कि मनुष्य की कई दृष्टियाँ है और उन्हें किसी सत्य के लिए, किसी एकीक्रत या एकाग्र सत्य के बलि नहीं दिया जाना चाहिए।"[3]


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ

टीका-टिप्पणी

  1. वही, पृ. 151
  2. 'गोधूलि में', 'कविता का गल्प' में संकलित, राधाकृष्ण प्रकाशन, प्र. सं. 1996, पृ. 157
  3. 'साहित्य का पक्ष', सीढियाँ शुरू हो गई हैं, वाणी प्रकाशन, प्र.सं. - 1996, पृ. 103
वैयक्तिक औज़ार

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