गवेषणा 2011 पृ-172

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'सूर्यदीप्त कविता' शीर्षक अपने एक संक्षिप्त लेख में इसी विषय पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं, "महात्मा गांधी की एक अवधारणा को उधार लेकर कहें कि कविता इतिहास की तानाशाही, विचारधाराओं के उपनिवेशवाद और धर्मांधता के विरूद्घ एक असमाप्य सत्याग्रह है। वह मनुष्य और उसके और पर्यावरण को बचाने, भाषाई परिवेश का उसका पूरी बहुलता में संरक्षण करने और सारे जीवन की, जिसमें मनुष्य और मनुष्येत्तर जीवन शामिल है, पवित्रता की निरंतरता के लिए सत्याग्रह भी है।"[1]

यहाँ गांधी की राजनीतिक और अशोक वाजपेयी की साहित्यिक भाव-भूमि के स्वराज की समानता स्पष्ट हो जाती है और यह भी कि अशोक वाजपेयी के साहित्य के स्वराज की अवधारणा गांधी के स्वराज की संकल्पना से साहित्यिक भाव-भूमि पर प्रभावित भी है।

बावजूद इस समानता और प्रभाव के हमारे विचारणीय विषय की दिशा सर्वथा भिन्न है। क्योंकि अशोक वाजपेयी के साहित्य के स्वराज की भाव भूमि साहित्यिक है, न कि गांधी के स्वराज की तरह राजनीतिक।

अशोक वाजपेयी कविता को एक स्वायत्तशासी संस्था (Autonomous body) की तरह देखना चाहते हैं। साहित्य में तथाकथित प्रतिबद्घता और प्रगतिशीलता का समर्थन खेमा अशोक जी की इस 'ऑटोनोमी' को प्रगति, समाज और मनुष्य विरोधी बताकर उन्हें 'कलावादी' होने का फतवा देता रहता है और इस प्रकार मनुष्य और संसार के छोटे-छोटे सचों को बचाए रखने की जिद का असमाप्य सत्याग्रह करने वाले अशोक वाजपेयी वृहत्तर हिंदी समाज में मनुष्य और प्रगति विरोधी एक कलावादी लेखक करार दे दिए जाते हैं।

कलावाद बीते पश्चिमी इतिहास का एक महत्वपूर्ण साहित्यांदोलन रहा है, जिसकी मूल स्थापना थी-कला, कला के लिए। पिछली सदियों में यूरोप में बिंबवाद, प्रतीकवाद, घनवाद, अभिव्यंजनावाद आदि ऐसे अनेक साहित्यांदोलन हुए, जो साहित्य अथवा कला में शिल्प-तत्व के प्रति अतिरिक्त आग्रही थे। भाषा और शब्द के प्रति भी उनका विशेष आग्रह था। साहित्य अथवा कला को सिर्फ कला के लिए मानने के उनके प्रबल आग्रह के कारण जीवन, ब्राह्रा यथार्थ और मनुष्य के वास्तविक अनुभव संसार से ऐसे शिल्पाग्रही रूपवादियों की दूरी सचमुच आग्राह्रा थी।

अशोक वाजपेयी भी कविता में शब्द, भाषा और कुल मिलाकर शिल्प की महिमा का बखान और उनका आग्रह करते हैं। उनकी कविताएँ प्राय: शिल्प की दृष्टि से सुगठित और बिम्धर्मी हैं। कविता में शिल्प और भाषा पर उनका आग्रह निर्णायक है। उनके कुछ वक्तव्य देखें, "कविताएँ प्रथमत: और अंतत: शब्द ही हैं।"[2] शब्द ही कवि का ईश्वर है। उसमें अलग ईश्वर की दरकार नहीं। कविता शब्द का धर्म है।"[3] "भाषा का घेराव बहुत बड़ा है और प्राय: हर क्षण वह हमें घेरे है। कविता इस घेराव से मुक्ति है, पर यह मुक्ति भाषा से पल्ला झाड़कर नहीं, उसी का संयोजन रचकर पायी जाती है। यह भाषा से नहीं, भाषा में मुक्ति है।"[4]

चूंकि कलावादियों का सबसे अधिक आग्रह शब्द और भाषा पर रहा है, जो कि शिल्प के प्रधान निर्मित तत्व हैं और अशोक वाजपेयी का भी विशेष झुकाव कविता में शब्द, भाषा और शिल्प पर है, अत: उन्हें उनके विरोधियों द्वारा आसानी से कलावादी सिद्घ किया जा सका है।

अशोक वाजपेयी अपने ऊपर इस आरोप को खारिज करते हैं। वे अपने वक्तव्यों में यह स्पष्ट करते हैं कि वे न तो आरोपित अर्थों में जीवन-विरोधी कलावादी हैं, न कलावाद के हेय अर्थों में। बल्कि मनुष्य और उसके संघर्ष को भाषा के समानांतर परम मूल्य मानते हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ

टीका-टिप्पणी

  1. 'कविता का गल्प', राधाकृष्ण प्रकाशन, प्र.सं. 1996, पृ. 40-41
  2. 'पांव भर जीरे में ब्रह्मभोज', राजकमल प्रकाशन, प्र. सं. 2003 पृ.72
  3. वही, पृ. 77
  4. वही, पृ. 25
वैयक्तिक औज़ार

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