गवेषणा 2011 पृ-20

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प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण

उर्मिला शर्मा

ब किसी भाषा का प्रयोग भिन्न भिन्न संदर्भों में अलग-अलग प्रयोजनों के लिए किया जाता है, जब उस विशिष्ठ संदर्भ में उस भाषा की शब्दाबली और संरचना विकसित हो जाती है। उदाहरण के लिए आज हिंदी का प्रयोग केवल बोलचाल या साहित्य की भाषा तक ही समिति नहीं है। बल्कि न जाने कितने विषय क्षेत्रों मे उसका बखूवी प्रयोग हो रहा है। चाहे सरकारी कार्यालय हो, या बैंक हों, विज्ञान और तकनीकी का क्षेत्र हो, व्यवसाय हो, पत्रकारिता या मीडिया का क्षेत्र हो सभी क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग का जा रहा है। इन सभी क्षेत्रों की हिंदी की आज अपनी–अपनी ‘पारिभाषिक शब्दावली’ और ‘विशिष्ठ सूचनाएँ विकसित हो चुकी है जो भाषा रूप को दूसरे से अलग करती है, भाषा के इन्ही रूपों को हिंदी 'बैंकिंग हिंदी' जनसंचार माध्यमों की हिंदी', ‘वाणिज्य एवं व्यापार की हिंदी’, 'पत्रकारिता की हिंदी, 'सेना में हिंदी', 'रेलवे में हिंदी' आदि न जाने कितने हिंदी के प्रयोजनमूलक रूप विकसित हो चुके हैं। प्रयोजनमूलक भाषा की प्रयोजनमूलक शैलियों को ही 'प्रयुक्ति' कहा जाता है। तकनीकी ढंग से कहें तो कह सकते हैं कि कार्यालयीन हिंदी अथवाष्पत्रकारिता की हिंदी आदि सभी रूप हिंदी की प्रयुक्तियाँ जो अपने-अपने विषय क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग होने के फलस्वरूप विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए पत्रकारिता की हिंदी में सोना/चांदी महँगे/सस्ते नहीं होते बल्कि 'सोना उछलता है' और चाँदी लुढ़कती है', दाले नरम पड़ती है तो तिलहन गरम हो जाता है', जैसे- सोना उछला, चाँदी लुढ़की, दाले नरम, तिलहन गरम।

प्रयोजनमूलक हिन्दी के विकास के कारण

भारत जैसे देश में प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास के कारणों पर विचार करें तो इस दशा में तीन महत्वपूर्ण कारण हमारे सामने आते हैं : भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा बनाया(पेज न0 21) जाना तथा उसके विकास के लिए विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाएँ किया जाना, तरह तरह के तकनीकी उपकरण तथा कम्प्यूटर तथा आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराया जाना तथा सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा राजभाषा हिंदी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दिया जाना, ये तीनों ऐसे घटक हैं जिनके कारण प्रयोजनमूलक हिंदी का विकास विभिन्न विषय क्षेत्रों में तीव्रता के साथ हुआ।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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