गवेषणा 2011 पृ-24

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2. तकनीकी कारण:

आज का युग विज्ञान और तकनीकी का युग है। सूचनाओं का जिस प्रकार आज विस्फोट हो रहा है, वैसा आज से पहले कभी नहीं हुआ। कंम्प्यूटर के आगमन से आज ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में बहुत बड़ा बदलाव दिखाई देता है। जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ आज कम्प्यूटर ने अपनी उपयोगिता साबित न की हो। जहाँ तक भाषाओं के अध्ययन, विश्लेषण, प्रचार एवं प्रसार की बात है, उसके लिए भी यांत्रिक उपकरणों तथा कम्प्यूटर की मदद से हम अपने लक्ष्य को बहुत ही सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ तक प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास की बात है, यांत्रिक उपकरणों एवं कम्प्यूटरों की मदद से विभिन्न कार्य-कलाप सुगमता एवं तीव्रता से संपन्न किए जा सकते हैं। अनुवाद के कार्य में कंम्प्यूटर काफी उपयोगी साबित हुआ है। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने की तुलना में किसी भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में अनुवाद करना अपेक्षाकृत आसान कार्य है, क्योंकि यहाँ एक तो समान शब्दावली काफी मात्रा में मिलती है दूसरे सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश भी समान है। अनुवाद कार्य के लिए दो चीजों का विशेष महत्व होता है: 'कोश' तथा 'भाषिक विश्लेषण'। कंम्प्यूटर के अनुवाद के लिए द्विभाषी कोश तैयार करना बहुत जरूरी है। प्रारंभ मे भाषा विश्लेषण और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग को साथ-साथ रखा गया था। लेकिन आगे चलकर यह अनुभव किया गया कि दोनों को अलग-अलग रखना ही ठीक होगा क्योंकि भाषिक विश्लेषण में यदि किसी कारण से कुछ परिवर्तन करना पड़ता है तो सारा प्रोग्राम ही बदलना पड़ सकता है। आज कम्प्यूटर से हिंदी मे काम किया जाना आंरभ हो गया है। चाहे वह पुस्तक हो या चाहे पत्र-पत्रिकाएँ हों, कम्प्यूटर की मदद से हम अनुवाद कार्य कम समय मे तीव्रता से कर सकते हैं। जब विश्व में विदेशी भाषाओं के विकास में कम्प्यूटर और यांत्रिक उपकरण इतने उपयोगी साबित हुए हैं तो प्रयोजनूलक हिंदी के विकास के लिए भी इनका उपयोग किया जाए तो हम अपने लक्ष्य को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैं। आज हिंदी मे कार्य किए जाने के लिए, राजभाषा विभाग के प्रयत्न से, विभिन्न प्रकार की यांत्रिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं परंतु वे अभी भी पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में और भी तेजी से कार्य करने की आवश्यकता है।

3.संस्थागत कारण: प्रयोजनमूलक हिंदी के विकास में गैर सरकारी तथा गैर-सरकारी दोनों ही प्रकार की संस्थाओं की विशिष्ट भूमिका रही है। जहाँ तक गैर-सरकारी संस्थाओं का सवाल है, इनमें से अधिकांश स्वतंत्रता पूर्व से ही हिंदी की सेवा कर ही हैं। दूसरी ओर सरकारी संस्थाओ ओर संगठनों की ओर से यह कार्य स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा का दरजा दिए जाने के बाद आरंभ हुआ है। सरकारी संगठनों के प्रयासों से जहाँ हिंदी के प्रयोजनमूलक रूप को विकसित होने का अवसर मिला है वहीं गैर-सरकारी संस्थाओं के द्वारा हिंदी का सर्वागीण विकास हुआ है।

ग़ैर सरकारी संस्थाएँ: भारत में स्वतंत्रता-आंदोलन के साथ ही साथ सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक आंदोलन ने भी जन-जीवन को काफी प्रभावित किया था।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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