गवेषणा 2011 पृ-27

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प्रयोजनमूलक हिंदी : वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा-रूप

जसपाली चौहान


भाषा और मनुष्य का आपसी संबंध कुछ इस प्रकार का है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। भाषा ही हमारे चिंतन, भाव-बोध तथा संप्रेषण का अन्यतम साधन है। हम न केवल भाषा के सहारे सोचते हैं, अपितु समझते-समझाते भी भाषा के सहारे हैं। भाषा ही हमारे स्मृति-कोश का एक मुख्य आधार है।

भाषा के जिस रूप का प्रयोग किसी विशिष्ट प्रयोजन की पूर्ति हेतु किया जाता है, उस भाषा-रूप का प्रयोजनमूलक भाषा (Functional Language) कहा जाता है।

हिंदी मे ‘फंक्शनल लैंग्वेज’ के समानार्थी शब्द के रूप में 'प्रयोजनमूलक' शब्द का प्रयोग बीसवीं सदी के सातवें दशक से होने लगा है।

प्रयोजनमूलक हिंदी का तात्पर्य है-जीवन की विविध विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उपयोग में लाई जाने वाली हिंदी। प्रयोनमूलक हिंदी का मुख्य लक्ष्य है-जीविकोपार्जन के विविध क्षेत्रों मे प्रयुक्त होने वाले भाषा-रूपों को प्रस्तुत करना बीसवीं शती के अंतिम पाँच दशकों में हिंदी केवल सामान्य बोलचाल तथा साहित्य तक ही सीमित न रहकर प्रशासन, न्याय, पत्रकारिता, वाणिज्य, बैंक, विज्ञापन, आदि विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रयुक्त हो रही है। ये सभी क्षेत्र औपचारिक भाषा-प्रयोग के क्षेत्र हैं, जिनके लिए हिंदी में, उन क्षेत्रों के भाषारूप को विकसित करने की आवश्यकता का अनुभव किया गया। इस प्रकार विभिन्न व्यवसायों से संबंधित व्यक्तियों जैसे– व्यापारी, पत्रकार, डॉक्टर, वकील, प्रशासक, वैज्ञानिक आदि के कार्यक्षेत्रों में प्रयुक्त विशिष्ट हिंदी का भाषा-रूप ही 'प्रयोजनमूलक' हिंदी कहलाता है।

आज हिंदी मात्र साहित्य-आस्वादन तक ही सीमित नहीं है, वरन् उसका उपयोग जीविकोपार्जन से सम्बद्ध विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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