गवेषणा 2011 पृ-30

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इन विषयों की भी अपनी विशिष्ट शब्दावली और अभिव्यक्ति-शैली होती है। याद रहे कि इन भाषा-रूप को भी हम तकनीकी भाषा कह सकते हैं, भले ही इनमें तकनीकीपन की मात्र, विज्ञान की भाषा की तुलना में बहुत कम हो। जैसे-
  1. पृथ्वी के वायुमण्डल में उपस्थित धूलकणों द्वारा सौर-प्रकाश का प्रकीर्णन हो जाने से दिन में सारा वायुमण्डल आलोकित हो उठता है। (भौतिकी)
  2. स्थानीय अनाज मंडी में राजस्थान से आवक घटने मध्य-प्रदेश में पड़ता न खाने तथा महाराष्ट्र और दक्षिण से चना दाल की भारी मांग आने से इनके भाव 30/40 रूपये का उछाल खा गए। (वाणिज्य)

पहले गंद्यांश में 'वायुमण्डल मे उचित धूलकण' सौर प्रकाश तथा प्रकीर्णन आदि विज्ञान के तकनीकी शब्द हैं। यहाँ 'वायुमण्डल' की जगह 'आकाश' नहीं कह सकते। 'धूलकण' की जगह 'धूल' नहीं कह सकते और प्रकीर्णन की जगह फैलना नहीं कह सकते। दूसरे गंद्याश का संबंध वाणिज्य से है और उसमें भी मंडी या बाजार भाव से संबंधित सूचना दी जा रही है। इसकी भाषा अधिक बोधगम्य है और अखबारी भाषा में है, जहाँ केवल स्वच्छ अभिव्यक्तियाँ जैसे 'आवक घटना', ‘पड़ता न खाना' तथा ‘उछाल खाना’ जैसे सरल तकनीकी शब्द हैं।

अत: तकनीकी भाषा में तकनीकीपन की मात्र एक समान नहीं होती। कुछ संदर्भों तथा विषयों में तकलीकीपन कम होता है और विषय का सामान्य-सा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी उसे समझ सकता है। इसके विपरीत कुछ तकनीकी भाषा-रूपों में तकनीकीपन की मात्रा अधिक होती है और कुछ में बहुत ही अधिक, जैसे कंप्यूटर विज्ञान, उच्चविज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की भाषाएँ इस प्रकार की अति तकनीकी भाषा को विषय का अच्छा जानकार या विशेषज्ञ ही पूरी तरह समझ पाता है।

सामान्य और वैज्ञानिक भाषा-रूपों में अन्तर

जब हम अपनी बात को एसे शब्दों और वाक्यों के माध्यम से व्यक्त करते है, जिनमें प्रचलित शाब्दिक अर्थ की अभिव्यक्ति होती है तो उसे हम सामान्य भाषा कहते हैं। यदि किसी भाषा-रूप के इच्छित को समझने के लिए हमें उसके शब्दों या वाक्यांशो के गूढ़ या विशिष्ट अर्थों को पूछना पड़े या उनके लाक्षणिक अर्थों का सहारा लेना पड़े, वह सामान्य भाषा से इतर होता है। इस दृष्टि से साहित्य भाषा और वैज्ञानिक भाषा दोनों सामान्य भाषा से किसी न किसी सीमा तक अलग सिद्घ होती है।

सामान्य भाषा में भी हम अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित करने के लिए कभी-कभी शब्दों का लाक्षणिक प्रयोग करते हैं। लेकिन यह केवल प्रांसगिक रूप में ही होता है लक्षणा, व्यंजना या अलंकार का प्रयोग मूलत: साहित्य की भाषा का गुण है। जैसे-जैसे किसी भी ज्ञान क्षेत्र की गहराई में हम जाते हैं, हमारे विचार सरल से जटिल होते जाते हैं, एक ही संकल्पना के अंन्तर्गत कई और उप-संकल्पनाएँ जन्म लेती हैं। फलस्वरूप हमारे शब्दों के अर्थ विशिष्ट होते जाते हैं, शैली बदलती जाती है और नए शब्दों का जन्म होता है। फलस्वरूप विज्ञान की भाषा सामान्य तथा साहित्यिक दोनों प्रकार के भाषा-रूपों से अलग होती जाती है। इन दोनों भाषा रूपों में निम्नलिखित अंतर महत्वपूर्ण है।



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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