गवेषणा 2011 पृ-31

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(क) वैज्ञानिक भाषा के शब्द और वाक्य-रूप हमेशा अभिधा में ही समझे जाते हैं, 'लक्षणा' या 'व्यंजना' में नहीं। इसके विपरीत साहित्यिक या काव्य-भाषा में लक्षणा, व्यंजना का बहुत अधिक प्रयोग होता है। वस्तुत: साहित्यिक भाषा सामान्य भाषा या अभिधा से जितनी दूर होगी, उतनी ही श्रेष्ठ प्रभावशाली मानी जाती है। नीचे लिखे वाक्य देखिए:
(1) साहित्यिक भाषा
- डिब्बे में ठसाठस अंधकार भरा था।
- उनकी चोंचे अखवार पर नहीं, उनकी नींद मे सुराख भेद रही थीं।
- उसके एक-एक शब्द में उसकी जीवन की कथा और उसके आंसुओं की ठंडी जलन भरी होती थी। (प्रेमचंद)
(2) वैज्ञानिक भाषा

जमीन और सागरों के असमान रूप से तपने के कारण ही हवाएँ जन्म लेती हैं। सागरों की अपेक्षा जमीन अधिक तेजी से तपती है। जमीन के ऊपर की गरम हवाएँ ऊपर उठकर सागरों की ओर बढ़ती हैं और सागरों के ऊपर की हवाएँ जमीन की ओर बहती हैं।

पहले अनुच्छेद में 'ठसाठस' सुराख भेद रही थी' और ठंडी जलन' अभिव्यक्तियों का प्रयोग जिन लाक्षणिक अर्थों के लिए हुआ है, वह साहित्यिक भाषा मे तो संभव है लेकिन विज्ञान की भाषा में नहीं। दूसरे चरण की भाषा विज्ञान की भाषा है, जिसमें हर शब्द या वाक्यांश अपने मूल शब्द अर्थ में ही समझा जाता है, लाक्षणिक अर्थ में नहीं।

(ख) अर्थ की सूक्ष्मता और निश्चिन्तता विज्ञान की भाषा का दूसरा प्रमुख गुण है। साहित्यिक भाषा में शब्दों और वाक्यों को उनके मूल अर्थों से हटाकर विस्तारित अर्थों में प्रयोग करने की प्रवृत्ति होती है। "टोडरमल अपनी कुर्सी पर बैठे हुए गरजे' या 'मुझ पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा' जैसी आंलकारिक अभिव्यक्तियां साहित्य की सशक्त भाषा का अंग हो सकती हैं, लेकिन विज्ञान की भाषा में केवल 'शेर' के संदर्भ में ही गरजने का प्रयोग होगा, व्यक्ति के संदर्भ में नहीं और 'पहाड़' का तात्पर्य वास्तविक 'पहाड़' ही होगा, लाक्षणिक 'पहाड़' नहीं। इस प्रकर हम पाते हैं कि साहित्य में एक बात को कहने के एक से अधिक विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं, लेकिन विज्ञान में किसी भी वस्तु या विचार को व्यक्त करने की एक नियत पद्घति या शैली होती है और हर वैज्ञानिक लगभग इसी पद्घति और शैली के दायरे के अन्तर्गत अपनी बात व्यक्त करता है। 'ओस' तथा 'तड़ित'-बिजली के संबंध में एक कवि और एक वैज्ञानिक की वर्णन शैलियों का नमूना देखिए:

ओस-

चांदनी का पालना मुझको झुलाता
फूल अपनी गोद में हॅंसकर सुलाता,
ओस हूँ मैं, रात ढलते जन्म मेरा
सूर्य का रथ सृष्टि से वापस बुलाता। (कवि विष्णु खन्ना)



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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