गवेषणा 2011 पृ-40

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हिंदी भाषा और प्रोद्योगिकी:विविध संभावनाएँ एवं चुनौतयाँ

शेफाली चतुर्वेदी


भाषा मनुष्य की सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। परस्पर विचार-विनिमय की साधन भाषा संप्रेषण के माध्यम से संबंधों का जाल बुनने की दिशा में सक्रियता से योगदान देती है। किसी समाज, जाति, वर्ग आदि से परिचित होने के लिए सर्वप्रथम उसकी भाषा से परिचित होना एक अनिवार्य शर्त है। संपूर्ण विश्व में विविध भाषाएँ एवं क्षेत्रीय बोलयाँ हैं। सभी भाषाओं का ज्ञान होना किसी एक व्यक्ति के लिए मुश्किल ही नहीं, असभंव भी है। बीसवीं सदी की सूचना-क्रांति एवं भूमण्डलीकरण के उपभोक्तावादी दृष्टिकोण के फलस्वरूप विविध देशे के बीच आपसी राजनैतिक एव आर्थिक संबंध जन्म ले रहे हे। ऐसी स्थिति में मात्र अपनी भाषा तक ही सीमित न रहकर वैश्विक परिदृश्य में विविध भाषाओं तथा अपनी भाषा की उपयोगिता के मूल्याकंन करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है और परिणाम अनुवाद, मशीनी अनुवाद तथा अन्य कई प्रक्रियाओं के रूप में सामने है। यह कार्य मैनुअली करना बहुत श्रमसाध्य तथा दुष्कर है, अत: इस क्षेत्र में इलैक्ट्रॉंनिक मशीन के सहारे की जरूरत ने ही भाषा-प्राद्योगिकी को जन्म दिया है। 'भाषा' शब्द भाषा-विज्ञान से लिया गया है तथा 'प्रोद्योगिकी' शब्द उद्योग एवं व्यवसाय से संबंधित है जिसका मुख्य उद्देश्य उत्पादन एवं वितरण है, वह भी कम समय में बड़े पैमाने पर। भाषा प्रोद्योगिकी एक शास्त्रीय, तकनीकी, प्रबंधकीय एवं अभियांत्रिकी शाखा है जो भाषीय सूचनाओं के तंत्र को विकसित करके उसका प्रयोग कम्प्यूटर के माध्यम से करते हुए मानव ओर मशीन के बीच सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को सुदृढ़ और सबल बनाती है। छोटे और अधिक शक्तिशाली कंप्यूटर द्वारा व्यापार, शिक्षा, कार्यालय आदि अनेक क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है। इनसाइक्लोपीडिया विकीपीडिया के अनुसार Language Technology is often called human language Technology (HLT) or netural language processing (NLP) and consists of computational linguistics (CL) and speech Technology as its core but includes also many application oritented aspects of them. Language Technology is closely connected to computer science and general linguistics.



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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