गवेषणा 2011 पृ-49

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी

ओम विकास


प्रौद्योगिकी और संस्कृति


मानव सभ्यता में बेहतर और गुणवत्ता के लिए सतत प्रतिस्पर्धात्मक विकास होते रहे हैं। शक्ति के मशीनीकरण से औद्योगिक क्रांति हुई, उत्पादन बढ़ा, टिकाऊ, सुन्दर उत्पाद कम कीमत पर सुलभ हुए। पहाड़ में सरंग बनाकर नदी का प्रवाह मोड़ना संभव हुआ। ट्रेन, बस, वायुयान यातायात के साधन सुलभ हुए। बिजली के आविष्कार से प्रकाश मिला और ऊर्जा का स्रोत भी। कोयला, पेट्रोलियम ईधन और बिजली ऊर्जा के स्रोत बने। परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन सस्ता हुआ। शक्ति के मशीनीकरण से अन्य नए-नए आविष्कारों के लिए अवसर खुले। लेन-देन की गणना की मशीनें बनी। ट्रांजिस्टर के अवष्किार से कंप्यूटर बने। कालांतर में इनका आकार छोटा होता गया। इनकी गणना शक्ति (प्रोसेसिंग पांवर) और स्मृति कोश (मेमोरी) प्रतिवर्ष बढ़ती गई। भविष्य में आज से 10 साल बाद आज के मूल्य पर ही प्रोसंसिंग पॉवर 100 गुणी, मेमोरी 1000 गुणी, बैडबिड्थ 100000 गुणी मिल सकेगी। 1970 के दशक में कंप्यूटर का प्रयोग हर क्षेत्र में संभव बनाकर उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ा दिया। सूचना का महत्व इस कदर बढ़ा कि डिजिटल इकोनोमी (सूचनापरक अर्थव्यवस्था) और अब नॉलेज इकोनोमी (ज्ञानपरक अर्थव्यवस्था) विश्व अर्थ-व्यवस्था की आधार स्तम्भ बनी है। टैक्नोलॉजी में बदलाव तेजी से हो रहे हैं- न्यूनतर आकार और बृहत्तर क्षमता के बेहतर उत्पाद कम कीमत पर सुलभ हो रहे हैं, आम आदमी तक की पहुँच में आने लगे हैं। निर्विवाद है कि आधुनिक तकनीकी उत्पादों से समाज मे जीवंतता आई है, गति भी बढी है, और नए ढंग से कुछ सोचने और करने की प्रवृत्ति भी जगी है। मोबाइल सैल फोन से ग्रामीण समाज की अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहे हैं। टी.वी., रेडियो और (पेज न0 50)अब इंटरनेट से देशी विदेशी जानकारी आसानी से ले पा रहे हैं। जानकारी का आदान-प्रदान कंप्यूटर से सुगम बनता जा रहा है। अलबत्ता अपनी भाषा में कंप्यूटर के प्रयोग का प्रशिक्षण आवश्यक है।



पीछे जाएँ
48
49
50
आगे जाएँ


गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता