गवेषणा 2011 पृ-5

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पूर्वपीठिका


केंद्रीय हिंदी संस्थान ने विगत पांच दशक में क्या कुछ नही किया और क्या निरंतर करता आ रहा है, यह आपको ज्ञात होगा, आइए, अब मिलकर कल्पना करते हैं कि हमारा संस्थान और क्या-क्या कर सकता है। संस्थान के उद्देश्य अत्यंत व्यापक हैं। देश और विदेश में हिंदी के प्रचार-प्रसार से हमें जन-जन का जीवन ज्योतित करना है।

हिंदी के बारे मे इन दिनों दो तरह की धारणाएँ हैं। एक धारणा कहती है कि हिंदी मर रही है। विदेशी छात्र जब हिंदी सीखने के लिए यहाँ आते हैं तो कहते हैं कि भारत में हिंदी की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। महानगरों मे तो सब अंग्रेजी बोलते है। कई भारतीय बुद्घिजीवी भी अब कहने लगे है कि हिंदी समाप्त हो रही है। दूसरी धारणा दूसरी तरह के आंकड़े लेकर सामने आती है कि हिंदी निरंतर फैल रही है, जन-संचार के सभी माघ्यमों के द्वारा। सर्वाधिक तेज गति से फैल रही है इंटरनेट के जरिये। हिंदी-शिक्षण को भी इन नए माध्यमों से जोड़ना चाहिए। फिल्मी-गीतों के जरिये जापान में हिंदी-शिक्षण का प्रयास किया गया। प्रो. तोमिओ मिजोकामी का प्रयोग अत्यंत सफल रहा।

आने वाला समय मोबाइल द्वारा ज्ञान-विस्तार का है। अपने संस्थान में हम भी मोबाइल के लिए हिंदी शिक्षण के पैकेज क्यों बनाएँ? अवश्य बनाएगें। मैंने पच्चीस वर्ष पहले प्रकाशित संस्थान की रजत जंयती की स्मारिका देखी। मुझे पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ। भाषा प्रयोगशाला, कम्प्यूटर केंद्र, दृश्य-श्रव्य कक्ष, ध्वनि-विज्ञान और मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ भविष्य की योजनाओं और सपनों के साथ सक्रिय थीं। पच्चीस वर्ष पहले बनाई गई योजनाओं और देखे गए सपनों को आज बहुत सरलता से पूरा किया जा सकता है। आज अनेक कम्प्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम हैं।

माइक्रोसॉफ्ट ने हिंदी को वैश्विक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। एपल, उबंतू, लाइनेक्स ने भी हिंदी को स्थान दिया है। माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के विंडोज नांइटी एट के बाद हमारे पास विंडोज टू थाउजैंड, एक्सपी, विस्टा आए, और आज विंडोज सेवन है। विंडोज टू थाउजैंड के बाद सभी में हिंदी ऐसे ही अंतर्भूत है, जैसे कबीर ने कभी गाया था-'मोको कहां ढूढें रे बन्दे मैं तेरे पास में। आज हिंदी हर कम्प्यूटर में अंतस्थ है। हमें सिर्फ देखना है कि कैसे कंट्रोल पैनल में जाकर हम रीजनल लैंग्वेज ऑप्सन्स में उसको एक्टिवेट करते हैं और मनवांछित कीबोर्ड का चयन करते हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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