गवेषणा 2011 पृ-54

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प्रयोजनमूलक हिंदी का स्वरूप

साहित्यिक हिंदी से इतर प्रयोग-क्षेत्र के अनुसार प्रयोजनमूलक हिंदी का विकास और व्यवहार टैक्नॉलोजी-सघन-अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। 'सबके लिए सब कुछ' की भाषायी नीति से काम नहीं चलेगा। 'जैसी मांग वैसी भाषा' की नीति के अनुसार प्रयोजनमूलक हिंदी का विकास, व्यवहार, शिक्षण-प्रशिक्षण किए जाने की आवश्यकता है।

प्रयोजनमूलक हिंदी का स्वरूप कैसा हो? सरल और सर्वग्राह्य हो। दिल्ली में सरल हिंदी का अभिप्राय होता है येन-केन-प्रकारेण अंग्रेजी-उर्दू शब्दों का बाहुल्य। शैली, भाषा-सौष्ठव और संप्रेक्षण के आधार पर इस मिश्रण की कोई कसौटी नहीं है। ऐसी भाषा महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक, केरल आदि के लोगों को सुगम हो, ऐसा भी नहीं है। आसानी से समझे जाने वाले संस्कृत के तत्सम, तद्भव अथवा अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग और प्रांत विशिष्ट शब्दों का समावेश बहुग्राहृा होगा। अंग्रेजी के संक्षेपाक्षर (WHO, WIPO, WTO, UNDO, IQ आदि), रासायनिक फार्मूले, (H2O, CH3, CuSO4 आदि), अंतराष्ट्रीय तकनीकी मापन संक्षेपाक्षर (Hz, Mbps, KB आदि) और विदेशी रोमन आधारित विशिष्ट शब्द रोमन में ही लिए जाएँ। संक्षेपाक्षरों का देवनागरीकरण शब्द विस्तार में सहायक नहीं होगा। प्रयोग क्षेत्र की विशिष्ट शब्दावली और अभिव्यक्ति-पैटर्न प्रयोग से कम से कम समय मे संप्रेषण-प्रभावी प्रस्तुति का आकर्षक प्रिंट मिल सके। संप्रेषण और प्रस्तुति की गुणवत्ता पर विशेष बल दिया जाए।

समाज टैक्नॉलोजी, राजतंत्र और व्यापार के प्रयोग क्षेत्र के अनुसार प्रयोजनमूलक हिंदी के प्रमुख भेद इस प्रकार हैं:

  1. मीडिया और जनसंचार की हिंदी
  2. तकनीकी हिंदी
  3. प्रशासनिक हिंदी
  4. वाणिज्यिक हिंदी

मीडिया से तात्पर्य है अखवार, विज्ञापन, फिल्म, टी.वी. (दूरदर्शन), रेडियो, इलेक्ट्रोनिक, बुलेटिन, इंटरनेट आदि। इसका उद्देश्य है कम शब्दों में तुरंत प्रभाव। सामान्यत: इस हिंदी की विधा स्थायी नहीं है, परिवर्तनशील है। भाषा शैली और शब्दों का सातत्व भी प्रधान नहीं हे जिससे समाज पर बिनबोझिल प्रभाव हो। यदि विज्ञापन कंपनियों को सही, सामयिक दिशा व सहयोग मिल जाए तो फिल्मों की भांति इनका भी महत्व है हिंदी को सहज ग्राह्य बनाने में।

विज्ञापन की भाषा उत्पाद-प्रधान होती है, जबकि पत्रकारिता/जनसंचार की भाषा संप्रेषण प्रधान होती है और नई टैक्नॉलोजी और उत्पादों के प्रति समाज के ग्राह्यता स्तर के अनुसार परिवर्तनशील होती है। समाज ज्यों-ज्यों टैक्नॉलोजी को आत्मसात करता जाता है, जनसंचार की भाषा भी त्यों-त्यों परिष्कृत और परिपक्व होती जाती है।

तकनीकी हिंदी में अनुवाद की शुद्धता, विषय की सरकारी स्पष्ट अभिव्यक्ति और संप्रेषणीयता महत्वपूर्ण होते हैं। विज्ञान और टैक्नॉलोजी के क्षेत्र में सूचना-टैक्नॉलोजी, बायाटैक्नॉलोजी मटीरियल-सांइस, मैंन्यूफैक्चरिंग-सांइस, जेनेटिक-इंजीनियरिंग इत्यादि नए विषय विकसित होते रहे हैं। इस प्रकार विज्ञान और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र मे अनुवाद नितांत आवश्यक हो गया है। अनुवाद की गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है। बहुधा-अटपटा अनुवाद दिखाई देता है, जिसमें शब्दानुशब्द पर बल दिया जाता है। प्राय: प्रयोक्ता-परिवेश से मेल नहीं खाता, भाव और संदर्भ उपेक्षित रहते हैं। ऐसे अनुवाद की संप्रेषणीयता और तदनुसार उपादेयता बहुत कम होती है। तकनीकी अनुवाद इंटेलीजेंट ट्रांसलेशन हो, जो सुबोध, संप्रेषणीय और रोचक हो। मशीन सह अनुसृजन (IMTHT: Integrated Machine Translation and Human Transcreation ) से कम समय मे सुबोध अनुसृजन संभव है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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