गवेषणा 2011 पृ-65

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प्रयोजनमूलक हिंदी का प्रयोग लोक-व्यवहार में नहीं होकर राजभाषा के रूप मे प्रयुक्त होता है जो शासनतंत्र की भाषा भी कहलाती है। इसलिए यह भाषिक व्यवहार वैयक्तिक नहीं होकर निर्वयक्तिक रूप मे प्रयुक्त होती है। इसलिए प्रशासनिक काम-काज में जब हिन्दी का व्यवहार होता है तो इसमें कर्तृवाच्य की जगह कर्म-वाच्य की प्रधानता होती है, इसमें कथन व्यक्ति सापेक्ष न होकर व्यक्ति निरपेक्ष होता है। जैसे -सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है', न कि 'सर्वसाधारण को सूचित करता हूँ। आवश्यक कार्यवाही की जाए, न कि आवश्यक कार्यवाही करें। प्रयोजनमूलक हिन्दी के राजभाषा स्वरूप में अनेक ऐसे शब्द भी बना लिए गए हैं जिनके लिए उर्दू परम्परा से गृहीत शब्द पहले से प्रचलित रहे हैं। परिणामस्वरूप अंग्रेजी के काफी प्रशासनिक शब्द ऐसे हैं जिनके लिए हिन्दी में अन्य शब्द प्रचलित हैं

 

Agreement form - करारनामा - अनुबंध-पत्र
Affidavit - हलफनामा - शपथ-पत्र
Tender - टेंडर - निविदा
Office - दफ्तर - कार्यालय
Collector - जिलाधीश - जिला मजिस्ट्रेट

प्रयोजनमूलक हिन्दी के कार्यालयी स्वरूप में सामान्य भाषा के अनेक ऐसे शब्द हैं जो सामान्य व्यवहार और कार्यालय व्यवहार में भिन्न-भिन्न अर्थ मे प्रयुक्त होते हैं यथा :

बर्थ - जन्म, रेल परिवहन, सेवा मे सोने या बैठने का स्थान
टिप्पणी - प्रतिक्रिया, पाद टिप्पणी, विशेष निर्देश, अनुदेश, आकलन, सूचक आलोचनात्मक अभिव्यक्ति, अभिमत
ड्राफ्ट - धनराशि का आदेश-पत्र आलेखन, मसौदा, प्रारूपण (बैंक)

आदि शब्दों के अतिरिक्त 'भाव' शब्द साहित्य मे 'अनुभूति' का वाचक है तो बाजार में मूल्य का द्योतक है जैसे यह कविता भावपूर्ण है और सोने के भाव आसमान पर चढ़े। 'संज्ञा' सामान्य व्यवहार में 'चेतना' का द्योतक है तो व्याकरण में 'संज्ञा' नाम व्यक्ति आदि का द्योतक है।

प्रयोजनमूलक हिंदी सामान्य हिन्दी से भिन्न अनुवाद आधारित हिन्दी है, इसलिए कभी-कभी सरकारी पत्रों, निविदाओं की सूचनाओं को समझने में सुशिक्षितों को भी पसीना छूट जाता है। इसकी दुरूहता को कम करने के उद्देश्य से अनूदित सरल शब्दों या प्रचलित सामान्य हिन्दी शब्दों को अपनाना चाहिए।

बाजारीकरण के इस युग की व्यावसायिकता की होड़ में हिन्दी भाषा के कई शब्द, वाक्य या वाक्यांश को प्रयोजनार्थ पारिभाषिक रूप मे प्रयुक्त किया जाने लगा है। यथा बिकवाली कम होने से जीरा औधें मुहं गिरा, लेखों का अंकेक्षण 'एजी' से, रिकॉल का प्रावधान खारिज, मोबाइल धारकों को अनवांटेड कॉल्स से छुटकारा आदि के साथ-साथ Lux का जबरजस्त Funda भई वाह! क्या स्टाइल है। जैसे जुमलों ने प्रयोजनमूलक हिन्दी को समृद्घ किया है। बाजारवाद के पोषकों ने यह मान लिया है कि भौतिकता की दोड़ और महंगाई की होड़ में उपभोक्ता सामग्री खरीदने की हैसियत रखने वाला अंग्रेजीदां सुसंस्कृत अपभोक्ता है जो हिन्दी के खिचड़ीपन की अंग्रेजी मिश्रित भाषा को आधुनिक-सुसंस्कृत भाषा मानता है और हिन्दी भाषा को दकियानूसी और पिछडे़पन की भाषा कहकर उसका तिरस्कार करता है।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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