गवेषणा 2011 पृ-68

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हिंदी:वाणिज्य और व्यापार की भाषा

कृष्ण कुमार गोस्वामी


भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, औद्योगिकरण, बाजारवाद, साक्षरता, शिक्षा के प्रसार, लघु कुटीर उद्योगों के विकास आदि से वाणिज्य और व्यवसाय की प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में और जन व्यवहार की भाषा के रूप में हिंदी का संर्वधन हुआ है। इसके साथ-साथ वाणिज्य-शिक्षा के विकास, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, विज्ञान, बैंकिग और डाक-तार सेवाओं के विस्तार और संवर्धन आदि से हिंदी के प्रयोग-क्षेत्र में वृद्घि हुई है। इन प्रयोग-क्षेत्रों के विकास में आर्थिक आत्मनिर्भरता, न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति और रोजगार की व्यवस्था के उद्देश्यों की भी विशिष्ट भूमिका रही है। इसी संदर्भ में वाणिज्यिक और व्यावसायिक हिंदी एक विशिष्ट प्रयुक्ति क्षेत्र के रूप में उभर कर आई है। वास्तव मे कोई भी भाषा एक 'व्याकरण' तक अपने को सीमित नही रखती, वह तो व्याकरणों का समुच्चय होती है। उसके भीतर व्याकरणों की अनेक परतें होती हैं और इसलिए भाषा को व्यवस्थाओं की व्यवस्था (System of System) कहा गया है। इसीलिए भाषिक इकाई के प्रत्येक स्तर पर भाषा की प्रयुक्तियों से यह तथ्य सिद्घ होता है। इन्हीं प्रयुक्तियों के अन्तर्गत वाणिज्य-व्यवसाय की प्रयुक्ति व्यापक स्तर पर उभरी है। इन व्यावसायिक प्रयुक्ति के भीतर अनेक उपप्रयुक्तियों का जन्म भी हुआ है। व्यावसायिक प्रयोग क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा का जो कार्य क्षेत्र विकसित हुआ है, उसमे व्यापार, व्यवसाय, उद्योग, परिवहन, बैंक, कंपनी, सहकारिता और व्यावसायिक विज्ञापन, बाजार समाचार आदि उपप्रयुक्तियों का उल्लेखनीय योगदान है। प्रयोजनमूलक भाषा का यह सबसे व्यापक प्रयोग-क्षेत्र है। एक ही प्रयुक्ति के अन्तर्गत आने के बावजूद इसके विविध अंगो की भाषा की अपनी-अपनी विशिष्टता होती है। एक ओर यह प्रयुक्ति जीवन के लगभग सभी अनिवार्य कार्यकलापों से संबंध होती है। और दूसरी ओर इसमें क्षेत्र-विशेष से जुड़ी विशेषता भी निहित रहती है। यद्यपि वैज्ञानिक प्रयुक्ति जन सामान्य की पहुँच से दूर भी हो तो इसका प्रभाव आम आदमी के जीवन-यापन पर नहीं पड़ता, किंतु वाणिज्यिक और व्यावसायिक प्रयुक्ति के अनेक क्षेत्र जन सामान्य के लिए ही हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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