गवेषणा 2011 पृ-70

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बाजार समाचार

बाजार से संबंधित जो सूचनाएँ होती हैं, उनसे व्यवसाय की प्रगति में सहायता मिलती है। इसमें समाचार से बाजार का वास्तविक चित्र मिलता है। क्योंकि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में क्रय-विक्रय, उत्पादन, वितरण, मूल्य वृद्घि, सौदे-भुगतान का पूर्ण विवरण होता है। व्यवसाय संबंधी नीतियों-योजनाओं के कार्यान्वयन में इनकी विशिष्ट भूमिका होती है। वस्तु बाजार (Stock Market), मुद्रा बाजार (Money Market) तीन प्रकार के बाजारों का समीक्षात्मक विवरण मिलता है। इसमें प्रचलित तकनीकी शब्दों और अभिव्यक्तियों का प्राय: प्रयोग होता है। इसकी भाषा-शैली भी सामान्य भाषा से भिन्न होती है। इसकी लेखन निरपक्ष शैली व्यक्ति निरपेक्ष होती है। तकनीकी शब्दों और मुहावरों का प्रयोग होता है, तथ्यों का वर्णन होता है, अन्य पुरुष भूतकाल का प्रयोग होता है, अपना और शीर्षक भी स्पष्ट होता है। यह भाषा तटस्थता निष्पक्षता से परिपूर्ण होती है। इसकी शब्दावली अपना विशिष्ट अर्थ लिए होती है। उदाहरण के लिए बाजार मूल्य (Market Price) एक समय में वस्तु की चालू/मूल्य कुल व्यापार (Turn Over)] का एक निश्चित अवधि में बाजार में हुआ समस्त व्यापार और आमद (Arrivels) एक निश्चित अवधि में बिक्री के लिए आने वाला कुल माल। इसी प्रकार तेज मूल्य (Hard Price) अर्थात् जब मूल्य वृद्घि की ओर और मंदा मूल्य (Soft Price) अर्थात् जब मूल्य हृास की ओर हो। सबल या मजबूत बाजार, खुशहाल बाजार, शांत बाजार, मृत बाजार आदि शब्द भी अपना विशिष्ट अर्थ लिए हुए है।

बाजार में खामोशी बाजार टूटा, बाजार मूल्यों का टिके रहना, मूल्यों का पलटा खाना, सोना लुढ़का, गुड़ में तेजी, मूंग भड़की, गेहूँ मजबूत, चना उछला, चावल नरम, आर्थिक वृद्घि दर छह प्रतिशत तक होने की उम्मीद आदि अभिव्यक्तियों से व्यवसाय संबंधी सूचना मिलती है। ये विशिष्ट प्रयोग है जिनका अपना संदर्भपरक अर्थ होता है। इसी आधार पर व्यावसायिक उपप्रयुक्ति अर्थात बाजार समाचार की शैली भी एक प्रकार से तकनीकी और जनसंचार माध्यमों के द्वारा व्यावसायिक हिंदी का जो रूप बाजार समाचार और विज्ञापन द्वारा उभरा है वहॉं व्यवसाय की प्रयुक्ति के धरातल पर शैली-संदर्भित भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं।

विज्ञापन

विज्ञापन का माध्यम वास्तव में जनसंचार माध्यम है, किंतु इसके व्यावसायिक संदर्भ भी हैं। विज्ञापन के क्षेत्र में उत्पादक और उपभोक्ता के साथ-साथ जनसंचार और यातायात के साधन भी सिम्मिलित हैं। इसलिए सामान्य रूप से दृश्य, श्रव्य और दृश्य-श्रव्य माध्यमों से जो विज्ञापन आते हैं, उसकी भाषा में चार गुण भी मिलते हैं: आकर्षक तत्व, श्रव्यता और सुपाठ्यता, स्मरणीयता, विक्रय की शक्ति - ये विज्ञापन में प्रमुख हैं जिनके माध्यम से व्यवसायी को अनेक लाभ होते हैं-माँग बढ़ाना, माँग को बनाए रखना, अपनी वस्तु की गुणवत्ता की सूचना देना, मूल्य-गुण नियंत्रण।

उत्पादों के बारे में आकर्षण का तत्व उत्पन्न करने के लिए अनेक प्रकार की वाक्य संरचनाओं का प्रयोग होता है। 'और', क्योकि, 'सिर्फ', 'जरा-सा', 'अब आप समझे', जैसे वाक्यों से उत्पाद की गुणवत्ता की जानकारी मिलती है।

और नेसकेफ़ अब नए पैक में।

क्योकि, अनंत अनुराग ही जीवन है। (ग्रावियन सूटिंग्स)

सिर्फ सर्फ (सर्फ पाउडर) अब आप समझे, मैंने यह टिकिया क्यों ली ? (रिन साबुन)


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

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