गवेषणा 2011 पृ-72

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हिंदी मीडिया की भाषिकी

सुवास कुमार


क पुरानी मगर प्रासंगिक किताब के उल्लेख से एक बात रखना चाहूँगा सौ साल पहले गांधी जी ने 'हिन्द स्वराज' लिखा था, जिसकी शतवार्षिकी मनाने के उपलक्ष्य में हम सबने पिछले दिनों पढ़ा, चर्चा की और फिर हस्बमामूल भूलने भी लग गये हैं। गॉंधी की बात मैं उद्धृत करूँ तो अखवारों के बारे में उनकी दो टूक राय यह थी कि "अखवार अप्रमाणिक होते हैं, एक ही वात को दो शक्लें देते हैं। एक दलवाले उसी बात को बड़ा बनाकर दिखाते हैं, तो दूसरे दलवाले उसी बात को छोटा कर डालते हैं। जिस देश मे ऐसे अखवार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दशा होगी?........." यहाँ हमे रूककर सोचना चाहिए कि मीडिया का कोई सम्मिलित एक स्वर नही होता और सैद्वान्तिक रूप से जनपक्षी मीडिया भी संभव है, लेकिन जैसा कि हम सब जानते हैं, पूँजी का कारोबार ऐसा होता है कि जनपक्षी मीडिया अगर हो भी तो उसकी नक्कारखाने में तूती की आवाज भर भी रह जाती है। गांधी जी पश्चिमी सभ्यता के कट्टर विरोधी थे और पश्चिमी सभ्यता के प्रचारकों की चालाकियों को समझते थे। वे लिखते हैं " हम जो बाते पढ़ते हैं, वे सभ्यता की हिमायत करने वालों की बातें होती हैं। उनमें बहुत होशियार और भले आदमी हैं। उनके लेखों से हम चौंधिया जाते हैं। यों एक के बाद दूसरा आदमी उसमें फँसता जाता है।..... आज हर कोई चाहे जो लिखता है और छपवाता है और लोगों के मन को भरमाता है। यह सभ्यता की निशाली है।"

हमें गांधी जी की यह बात तत्कालीन अंग्रेजी पत्रकारिता के सन्दर्भ में देखनी चाहिए, जो अंग्रेजी शासन के इशारे पर पनप रही थी। 'हिन्द स्वराज' में लिखते हैं, "करोड़ो लोगों को अंग्रेजी में शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है।..... यह कितने दुख की बात है कि स्वराज की बात भी परायी भाषा मे करते हैं?........ अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है।........ क्या यह कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इंसाफ पाना है तो अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए।...... सारे हिन्दुस्तान के लिए भाषा होनी चाहिए, वह तो हिन्दी ही होनी चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट होनी चाहिए।"



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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