गवेषणा 2011 पृ-83

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इसी प्रकार एक पत्रिका की पंक्तियाँ

पेड़ों पर से कोयल का बोलना बहुत भला लगता था

के स्थान पर

पेड़ों पर कोयलों का बोलना बहुत भला लगता था

और यह भी

जगह-जगह मनुष्य और पशुओं की लाशें पड़ी सड़ रहीं थीं

के स्थान पर

जगह-जगह मनुष्यों और पशुओं की लाशें पड़ी सड़ रही थीं

नौसिखिए संवाददाताओं में विवेक की कमी और अज्ञानता के कारण भाषा में वचन संबंधी परिवर्तन पढ़ने को मिल रहे हैं।


लिंग संबंधी परिवर्तन – व्यावसायिक ही नहीं, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में भी अक्सर लिंग संबंधी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। पूर्वांचल के लेखक और पत्रकार वाच्य संबंधी प्रयोगों में अक्सर गलती करते हैं। द्रष्टव्य हैं इस तरह के कुछ उदाहरण-

1. नेताओं ने पहले देश की अमीरी-गरीबी के नाम पर राजनीति किए

इसमें ‘राजनीति’ शब्द स्त्रीलिंग है। अत: ‘करना’ क्रिया अपने कर्म के अनुसार होगी ‘की’। इस प्रकार सही प्रयोग यह होना चाहिए कि

देश के नेताओं ने पहले देश की अमीरी-गरीबी के नाम पर राजनीति की

2. एक समाचार पत्र के संपादकीय में लिखा था-

इस पद को पाने के लिए राष्ट्रपति की दया और कृपा चाहिए होगी।

- ‘दैनिक जागरण’ संपादकीय 1.04.1997

यहाँ चाहिए होगी का प्रयोग एकदम असंगत और भद्दा लग रहा है। इसके स्थान पर कृपा की अपेक्षा होगी या फिर कृपा की अपेक्षा बनी रहेगी होना चाहिए। यह तो संपादकीय की स्थिति है। बाकी पेजों की सामग्री कि स्थिति क्या होगी? अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।


भाषागत अशुद्धियों के परिवर्तन – आजकल ‘ये’ और ‘यह’ को लेकर बड़े-बड़े लेखकों और संपादकों में भी भ्रम की स्थिति है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इसका गलत प्रयोग देखने को मिलता है। ‘तद्भव’ हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका है। इस पत्रिका की स्टार लेखिका नीलाक्षी सिंह की ‘एक था बुझवन’ कहानी पुरस्कृत भी हुई थी। इस कहानी की भाषा में

"इसका कारण ये कि अपने बनाए घरों के.............., सबसे दिलचस्प ये कि किसान अन्तिम सीन.................., ये औरत सब कुछ................, खबर ये कि ठाकुर................।" में 'ये' और 'यह' के गलत प्रयोग हैं। ‘हंस’ के अप्रैल, 2005 अंक में मनीषा की टिप्पणी में भी लेखिका ‘ये’ और ‘यह’ का अन्तर नहीं समझ पाई हैं।

इस प्रकार उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पत्र-पत्रिकाओं की भाषा में जल्दबाजी में अनेक त्रुटियाँ देखने को मिल रही हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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