गवेषणा 2011 पृ-86

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जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी

गोविन्द स्वरूप गुप्त


'जनसंचार' शब्द समूह में प्रयुक्त शब्द ‘संचार’ से तात्पर्य है किसी बात को आगे ‘बढ़ाना’ या ‘चलाना’ या ‘फैलाना’। ‘संचार’ शब्द की मूल धातु संस्कृत की ‘चर’ है। अर्थात् ‘चलना’। दूसरे शब्दों में जब हम किसी भाव या विचार या जानकारी को दूसरों तक पहुँचाते हैं और यह प्रक्रिया सामूहिक पैमाने पर होती है तो इसे ‘जनसंचार’ (Mass Communication) कहते हैं। जनसंचार का उद्देश्य जानकारी या विचारों को समाज के उन तमाम लोगों के लिए साझा करना है जो इनसे संबंध हैं या जिन्हें यह जानकारी पहुँचाना अपेक्षित है ताकि सभी लोग इनसे अवगत हो सकें तथा लाभी उठा सकें।

संचार में तीन तत्व होते हैं – भेजने वाला, संचार का माध्यम तथा उसे प्राप्त करने वाला। प्रेषक के सक्षम होने अथप संदेश के अस्पष्ट होने अथवा संदेश प्राप्त करने वाले के उसे न समझ पाने की स्थिति में संचार प्रक्रिया असफल हो जाती है। लोक प्रचार माध्यम का अपने श्रोताओं पर सीधा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। संचार–माध्यम निम्नलिखित सात रूपों में आज हमारे सामने प्रस्तुत हैं-

  1. विज्ञापन ब्रोश्यूर
  2. पत्र-पत्रिकाएँ
  3. रंगमंच
  4. चित्रपट
  5. आकाशवाणी
  6. दूरदर्शन
  7. प्रचार उत्सव, सम्मेलन परिसंवाद आदि।

प्रथम दो लिखित शब्दों तक सीमित हैं। शेष पाँच दृश्य और श्रव्य, वाचिक परंपरा और बोले हुए शब्द से संबंद्ध हैं।

विज्ञापन, ब्रोश्यूर आदि की दृष्टि से विचार करें, तो सरकार एवं गैर सरकारी स्तर पर समय–समय पर अनेक विज्ञापन दिये जाते हैं। केंद्र सरकार का डी०ए०वी०पी० इस दृष्टि से सक्रिय है। सरकारी योजनाओं की प्रगति के विवरण का विज्ञापन देता रहता है। अब सरकारी विज्ञापनों का चलन काफी बढ़ गया है। सूचना तथा नीलामी सूचनाएँ विज्ञापन के अन्तर्गत ही समझी जाने लगी हैं। रिक्त–स्थानों की सूचना का विज्ञापन, राज्यों के आयोग तथा संघ लोकसेवा आयोग निरंतर देते रहते हैं। अनेक समाचार–पत्रों की आय का मुख्य साधन ही सरकारी विज्ञापन हो गए हैं।


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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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