गवेषणा 2011 पृ-9

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यह अंक


'प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप' पर केंद्रित 'गवेषणा' का यह अंक केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्वर्ण-जयंती के अवसर पर प्रकाशित हो रहा है। इसके कई निहितार्थ है। पहला यह कि संस्थान अपने पचास वर्ष पूरे होने के अवसर पर हिंदी की प्रयोजनमूलकता पर विशेषांक के बहाने विशेष चर्चा कर रहा है। और यह प्रयोजनमूलकता संस्थान की कार्य पद्घति और उद्देश्य से सीधे-सीधे संबद्घ है और दूसरे यह कि संस्थान अपने लक्ष्य-समूह को अपनी स्वर्ण-जंयती के बहाने याद करने का अवसर जुगा ले रहा है, और तीसरे कि संस्थान अपने लक्ष्य और लक्ष्य की कार्यपालक स्मृति का सुदूर भविष्य में प्रक्षेपित करने की मंशा लिए हुए है।

इक्कीसवीं सदी में कोई भी भाषा मात्र अपनी शुद्ध सैद्घान्तिकी तक सीमित रहकर दीर्घकाल तक अपने अस्तित्व को महफूज नहीं रख सकती। भाषाओं की उत्तरजीविता किसी भाषा की सामान्य भाव–भंगिमा से तय नहीं हो सकती। अपनी उत्तरजीविता चाहने वाली प्रत्येक सशक्त भाषा को जीवन के हर कोने-अंतरे में प्रवेश करना होगा-वहां झांकना और वहां से गुजरना होगा। ऐसी हर कोशिश में भाषा विभिन्न प्रयुक्ति-क्षेत्रों की गिरफ्त में होगी।

ये प्रयुक्ति-क्षेत्र ही किसी भाषा का स्वरूप, संरचना और व्याकरण तय करेंगे। इस प्रकार देखें तो वस्तुत: भाषा का क्षेत्र स्वायत्तशासी क्षेत्र नहीं है। वह अपने प्रयोजन के विस्तार के लिए भाषेतर प्रयुक्ति-क्षेत्रों पर निर्भर है। यहां तक कि भाषा का परम स्वभाव-सटीक व्याकरण भी प्रयोजन की मांग पर विभिन्न प्रयुक्ति-क्षत्रों में विचलन का शिकार हो सकता है। अपनी हिंदी के बारे में भी यही तथ्य है।

वस्तुत: भाषा अपने स्वायत्त क्षेत्र, जिसके परिसर में व्याकरण की शुद्धता की अचूक उपस्थिति है, से बाहर प्रयोजनों के कोलाहल में आते ही अपने मूल चरित्र पर आघात पाती है, जिस पर शुद्धतावादी हंगामा बरपाते हैं, और अशुद्घ भाषा के पैरोकार उसे संभावनाओं के अनंत में ले उड़ते हैं।



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गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
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