गवेषणा 2011 पृ-92

ज्ञानकोश से
यहां जाएं: भ्रमण, खोज


संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका

जितेन्द्र कुमार सिंह


हिंदी का वर्तमान गौरवपूर्ण है। उसकी भूमिका आज भी सामान्य-जन को जोड़ने में सभी भाषाओं की अपेक्षा सबसे अधिक कारगर है। एक भाषा-भाषी जिस भाषा के माध्यम के किसी दूसरी भाषा के बोलने वालों के साथ संपर्क स्थापित कर सके, उसे संपर्क-भाषा (Link Language) कहते हैं। ऐसी भाषा मात्र दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के बीच संपर्क का माध्यम नहीं बनती, जो एक-दूसरे की भाषा से परिचित नहीं हैं, अपितु दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी राज्यों के बीच तथा केंद्र और राज्यों के बीच भी संपर्क स्थापित करने का माध्यम बन सकती है।


संपर्क-भाषा : परिभाषा एवं स्वरूप :

संपर्क-भाषा को परिभाषित करते हुए डॉ. दंगल झाल्टे ने अपनी पुस्तक ‘प्रयोजनमूलक हिंदी : सिद्धांत और प्रयोग’ में लिखा है कि "अनेक भाषाओं की उपस्थिति के कारण जिस सुविधाजनक विशिष्ट-भाषा के माध्यम से व्यक्ति-व्यक्ति, राज्य-राज्य, राज्य-केंद्र तथा देश-विदेश के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है, उसे संपर्क-भाषा (Contact of Inter Language) की संज्ञा दी जाती है।" (पृ. 53)। इसी प्रकार डॉ. पूरनचंद टंडन ने ने अपनी पुस्तक ‘आजीविका साधक हिंदी’ में संपर्क-भाषा के रूप में हिंदी पर विचार करते हुए लिखा है कि ‘‘संपर्क–भाषा से तात्पर्य उस भाषा रूप से है, जो समाज के विभिन्न वर्गों या निवासियों के बीच संपर्क के काम आती है। इस दृष्टि से भिन्न–भिन्न बोली बोलने वाले अनेक वर्गों के बीच हिंदी एक संपर्क–भाषा है और अन्य कई भारतीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलने वालों के बीच भी संपर्क-भाषा है।" (पृ. 151)


पीछे जाएँ
91
92
93
आगे जाएँ


गवेषणा 2011 अनुक्रम
लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
आवरण पृष्ठ आवरण
पूर्वपीठिका अशोक चक्रधर 5
यह अंक के. बिजय कुमार 9
संपादकीय महेन्द्र सिंह राणा 11
प्रयोजनमूलक हिंदी के विविध रूप
प्रयोजनमूलक हिंदी: स्वरूप और संरचना रवि प्रकाश गुप्त 15
प्रयोजनमूलक हिंदी: विकास के कारण उर्मिल शर्मा 20
प्रयोजनमूलक हिंदी: वैज्ञानिक और तकनीकी भाषा रूप जसपाली चौहान 27
हिंदी भाषा और प्रौद्योगिकी: विविध संभावनाएं एवं चुनौतियां शेफाली चतुर्वेदी 40
व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिंदी ओम विकास 49
हिंदी भाषा, प्रयोजनमूलक हिंदी और बाजार श्रवण कुमार मीणा 63
हिंदी: वाणिज्य और व्यापार की भाषा कृष्ण कुमार गोस्वामी 68
हिंदी मीडिया की भाषिकी सुवास कुमार 72
पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिंदी भाषा का स्वरूप परिवर्तन सतीश शर्मा ‘जाफरावादी’ 80
जनसंचार माध्यमों के विज्ञापन में हिंदी गोविन्द स्वरूप गुप्त 86
मीडिया की हिंदी दुर्गेश नंदिनी 89
संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका जितेन्द्र कुमार सिंह 92
हिंदी: संपर्क भाषा की एक जीवंत परम्परा व्यासमणि त्रिपाठी 99
वैश्वीकरण के दौर में हिंदी का स्वरूप मनोज पांडेय 104
सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में हिंदी के विविध रूप एल.सुनीता राय 107
हिंदी भाषी समाज में कोड परिवर्तन का रूप सुमेधा शुक्ला 116
भाषा और जन-विसर्जन लालसा लाल तरंग 121
हिंदी भाषा: वर्तमान परिदृश्य सुनीता रानी घोष 129
व्याकरण-विचार
विद्रूपित होती हिंदी वर्तनी लक्ष्मी नारायण शर्मा 137
स्थाननाम और संबंधित शास्त्र प्रियंका सिंह 151
साहित्य-चिंतन
काव्य-भाषा में अस्मिता की खोज आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी 158
साहित का स्वराज बनाम विचारों का उपनिवेश प्रकाश साव 167
इस अंक के रचनाकारों के पते 175
सदस्यता फार्म 177
अंतिम पृष्ठ अंतिम पृष्ठ
वैयक्तिक औज़ार

संस्करण
क्रियाएं
सुस्वागतम्
सहायता