जब छात्र था

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लेखक- विट्ठलनारायण चौधरी

संस्थान के हिंदी से संबंधित अनेक कार्यों में से हिंदी शिक्षक प्रशिक्षण भी एक कार्य रहा है। इस संदर्भ में मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ कि सन 1969 में मैं केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का हिंदी शिक्षण पारंगत का छात्राध्यापक रहा हूँ।

यह कहते हुए मुझे हर्ष होता है कि सन 1969 से आज तक, कभी छात्राध्यापक के नाते तो कभी संस्थान की गतिविधियों में सहयोगी के नाते मेरा आत्मीय जुड़ाव रहा है और यह आजीवन रहेगा। जब मैं संस्थान का छात्राध्यापक था, तब वहाँ मैंने लघु भारत का दर्शन किया। महाराष्ट्र, गुजरात, मणिपुर, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक आदि कई राज्यों के हिंदी अध्यापक राज्य सरकारों द्वारा प्रतिनियुक्त थे। उस समय संस्थान आगरा के दयालबाग में शायद किराये के भवन पर चलता था। निदेशक थे- आदरणीय डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा जी और रजिस्ट्रार थे- आदरणीय डॉ. पदमचंद्र अग्रवाल जी। दोनों ही बड़े विद्वान और मिलनसार थे। उन दिनों जिन विद्वान प्राध्यापकों द्वारा मैंने शिक्षा पायी, उनमें थे - सर्वश्री पं. रामकृष्ण गोस्वामी, अय्यंगार जी, डॉ. न. वी. राजगोपालन जी, प्रो. ईश्वर सिंह जी, डॉ. शंभुनाथ पांडेय जी, डॉ. वी. रा. जगन्नाथन जी, डॉ. किशोरी लाल शर्मा जी, डॉ. सीताराम शास्त्री जी, डॉ. तेजनारायण लाल जी, डॉ. चजुर्भुज सहाय जी, डॉ. जयकृष्ण विद्यालंकार जी आदि। सभी अपने-अपने विषय के विशेषज्ञ थे। पं. नावड़ा जी को सभी प्राध्यापक और प्रतिभागी विशेष आदर भरी दृष्टि से देखते थे, यह उन दिनों मैंने अनुभव किया।

संस्थान में डॉ. व्रजेश्वर वर्मा जी की सक्रियता के कारण अनेक गतिविधियाँ चलती थीं, ताकि छात्राध्यापकों का हिंदी शिक्षा का स्तर ऊँचा उठ सके और वे अपने राज्यों के विद्यालयों/महाविद्यालयों में जाकर आधुनिक भाषावैज्ञानिक पद्धति से अपने छात्रों को द्वितीय भाषा हिंदी की शिक्षा प्रदान कर सकें।

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संस्थान ने डॉ. एम. ए. चौहान जी के नेतृत्व में छात्रों के लिए शैक्षिक यात्रा का आयोजन किया था। प्रयाग में महादेवी वर्मा जी और सुमित्रानदंन पंत जी के निवास पर उनसे भेंट की और उन्हें सुना। हम कृतार्थ हुए। दोनों महान साहित्यकार यह जानकर अति प्रसन्न हुए कि हम संस्थान के छात्राध्यापक हैं। दोनों ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आप हिंदीतर भाषी होकर भी हिंदी शिक्षक के रूप में देश की महान सेवा कर रहे हैं। आधुनिक मीरा और कवि पंत जी के सादगी भरे जीवन ने मुझे काफी प्रभावित किया।

संस्थान के ही प्रांगण में दीक्षांत समारोह के अवसर पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" की वाणी सुनने का सुअवसर भी मिला। दिनकर जी के ओजस्वी शब्द आज भी मेरे स्मृति पटल पर हैं।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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