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लेखक- प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न

मुझे यह जानकर अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आगरा का केंद्रीय हिंदी संस्थान अपनी पचासवीं वर्ष-गाँठ मना हरा है। इस स्वर्णमय अवसर पर इस विराट संस्थान तथा इसकी सेवा में निरत सभी हिंदी प्रेमियों को मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ प्रकट करना चाहूँगा।

वास्तव में हिंदी प्रचार-प्रसार में तथा उसके शिक्षण-प्रशिक्षण में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का कार्य-कलाप बड़ा ही सराहनीय है। विगत पचास वर्षों में संस्थान की ख्याति केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के हर कोने में पहुँच गयी है। मेरी समझ में विश्व-भर में संस्थान का नाम प्रचलित होने का कारण वहाँ का सुव्यवस्थित विदेशी पाठ्यक्रम है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की सबसे बड़ी विशेषता उसके अनुसंधान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिंदी को मानक रूप दिलाने में इन अनुसंधानों का बड़ा यागदान रहा है। विगत लंबी अवधि में हिंदी से संबंधित जो अनुसंधान संस्थान ने किए हैं, उन्हें हिंदी जगत में पूरी मान्यता मिली और मानक हिंदी के विकास में उनकी अहम भूमिका भी रही है।

जहाँ तक संस्थान से मेरा अनुभव है, वह एक चलचित्र जैसा मेरी स्मृति से निकलता आ रहा है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के विदेशी पाठ्यक्रम का श्रीगणेश सन 1991 में हुआ था, तब मैं श्रीलंका के कॅलणिय विश्वविद्यालय का छात्र था। भारत सरकार के द्वारा प्राप्त छात्रवृत्ति के फलस्वरूप मुझे संस्थान के प्रथम विदेशी पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने का सौभाग्य मिला। उस समय संस्थान के निदेशक डॉ. बालगोविन्द मिश्र थे और विदेशी पाठ्यक्रम के प्रभारी डॉ. अमर बहादुर सिंह थे। कुछ दिनों बाद मिश्र जी की सेवानिवृत्ति हो गयी। डॉ. अमर बहादुर सिंह जी निदेशक बने और पिल्ले जी प्रभारी। श्रीलंका से मेरे साथ और एक बौद्ध भिक्षु भी थे और दुनिया के करीब दस-पंद्रह देशों से कई विद्यार्थी हिंदी के शिक्षण के लिए संस्थान आ चुके थे।

मेरी पढ़ाई तीन सौ कक्षा में हुई थी। उसमें करीब आठ विदेशी छात्र-छात्राएँ थे। तीन सौ कक्षा के पाठ्यक्रम के अनुसार हमें उच्चस्तरीय मौखिक कौशल, लेखन कौशल, प्रकार्यात्मक व्याकरण, पाठावली, हिंदी साहित्य आदि का अध्ययन करना था। मुझे यह बात आज भी याद है कि हिंदी व्याकरण डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ पढ़ाते थे और पाठावली पांडेय जी। श्रीमती ज्योत्सना रघुवंशी जी हिंदी साहित्य की कक्षा ले रही थीं और मधुमा जी मौखिक कौशल की कक्षा। हिंदी लेखन का अध्ययन हमने रावत जी के अधीन किया था। विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि ये सारे गुरु-जन हमें बड़े उत्साह, स्नेह और आदर के साथ पढ़ाते थे। हमें हिंदी के जानकार बनाना उन्हीं का एक लक्ष्य था और उन्होंने उसका अथक प्रयास किया। उनके पढ़ाने का ढंग भी बहुत विलक्षण था। इस अवसर पर इन सब गुरु-जनों का मैं आभारी हूँ और उनके चरण कमलों पर नत-मस्तक हो जाना अपना पुनीत कर्तव्य समझता हूँ। उल्लेखनीय बात यह है कि कुलश्रेष्ठ जी तथा ज्योत्सना जी के साथ मेरा संबंध विशेष था। यह इसलिए है कि पाठ्यक्रम के अलावा उत्तर भारतीय संस्कृति और वहाँ के लोक साहित्य की जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्होंने मुझे प्रशंसनीय सहयोग दिया था।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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