जापान में संस्थान 3

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विदेशों में रहकर जो छात्र हिंदी पढ़ते हैं, वे भाषा का पुस्तकीय ज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन हिंदी बोलने के कम अवसर मिलने के कारण वे बातचीत करने में संकोच करते हैं। संस्थान के हिंदीमय वातावरण में, जहाँ विश्वभर के छात्र हिंदी सीखते हैं, उन्हीं के बीच रहकर यदि ये छात्र-दल हिंदी बोलने का और बातचीत करने का अवसर पा सकें तो वे हिंदी भाषा में पारंगत हो सकेंगे और भविष्य में अपने-अपने देशों में हिंदी-भाषा शिक्षण का प्रचार-प्रसार करने में बड़े सहायक हो सकेंगे। आज के वैश्विक परिदृश्य में भारत के बढ़ते महत्व को देखते हुए हिंदी भाषा के प्रचार की आवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। फलत: ऐसे कार्यक्रमों में यदि कुछ धन भी व्यय करना पड़े तो यह भारत के लिए लाभकारी ही सिद्ध होगा।

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इसी के साथ-साथ केंद्रीय हिंदी संस्थान अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में एक और अन्य महत्वाकांक्षी योजना को भी हाथ में ले सकता है। वह एक ऐसा मानक शब्दकोश तैयार कराये, जिसमें हिंदी शब्दों का ऐसा चयन हो, जो हिंदी सीखने वालों के लिए अनिवार्य हो तथा उस शब्दकोश को उन विभिन्न विदेशी-भाषाओं के साथ जोड़ दें, जहाँ हिंदी शिक्षण की विशिष्ट परम्परा है। उदाहरण के लिए जापान में जापान की ओसाका यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर के. कोगा जी के हिंदी-जापानी शब्दकोश मैं को प्रस्तुत करना चाहूँगा। इस शब्दकोश के प्रकाशन के बाद से जापान में हिंदी-उर्दू पढ़ने-पढ़ाने वाले विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का काम बड़ा आसान हो गया है। इस शब्दकोश में 80 हजार से भी ज्यादा हिंदी एवं उर्दू के शब्दों की प्रविष्टियाँ हैं। इसके अतिरिक्त इन शब्दों के प्रयोग देकर उनके अर्थों को स्पष्ट किया गया है और उनको जापानी भाषा में भी प्रस्तुत किया गया है। 'मन' शब्द के लिए तो 350 से भी अधिक प्रयोगात्मक प्रविष्टियाँ इस कोश में हैं। प्रोफेसर कोगा के इस हिंदी-जपानी शब्दकोश की तर्ज पर ही हिंदी-एशयिन, हिंदी-पोलिश, हिंदी-चेक, हिंदी-जर्मन, हिंदी-हंगेरियन जैसे शब्दकोशों का निर्माण हो सके तो विश्व में हिंदी के शिक्षण की दिशा में एक बहुत बड़ी कमी की पूर्ति हो सकती है।

बहरहाल, केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना की स्वर्ण जयंती के अवसर पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

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क्रमांक लेख का नाम लेखक पृष्ठ संख्या
1. हिंदी वैकल्पिक हो गई है प्रो. रमानाथ सहाय 1
2. परिवर्तन और नए विश्वास....! प्रो. शंभुनाथ 3
3. जिन खोजा तिन पाइयाँ प्रो. सूरजभान सिंह 8
4. भाषा अध्ययन की नई प्रवृत्तियाँ प्रो. सुरेश कुमार 9
5. अनंत संभावनाएं....! प्रो. नित्यानंद पाण्डेय 12
6. आखिर आगरा क्यों? डॉ. न. वी. राजगोपालन 6
7. कम्प्यूटर-युग प्रो. माणिक गोविन्द चतुर्वेदी 19
8. हिंदी की ज्योति प्रो. वी. रा. जगन्नाथन 21
9. सर्वप्रथम पुरस्कार डॉ. बालशौरी रेड्डी 24
10. जापान में संस्थान प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण 26
11. नाश्ता मुझे आज भी याद है डॉ. कृष्ण कुमार शर्मा 29
12. एक वैश्विक उपस्थिति डॉ. हरजेन्द्र चौधरी 32
13. भेंट करायी.... हिंदी ने ए. अरविंदाक्षन 34
14. जहाँ हिंदी अपनी भूमि पर निश्चिंत होकर साँस लेती है... रंजना अरगड़े 38
15. श्रीलंका की पाती...! प्रो. इन्द्रा दसनायके 40
16. स्मृति के गलियारों से डॉ. मोहन लाल सर 44
17. लेखा - जोखा प्रो. अश्वनी कुमार श्रीवास्तव 49
18. बात करने का सलीका डॉ. अर्जुन तिवारी 51
19. जिम्मेदारी बढ़ती चली गई कैलाश चन्द भाटिया 53
20. पूर्वोत्तर भारत के वे दिन डॉ. पुष्पा श्रीवास्तव 55
21. आनंद की अनुभूति प्रो. पीतांबर ठासवाणी 59
22. सफर का सफरनामा डॉ. अरविंद कुलश्रेष्ठ 60
23. ऋण समिति का गठन डॉ. लक्ष्मी नारायण शर्मा 62
24. अब तुम्हारे हवाले शंकर लाल पुरोहित 63
25. नमन! उषा यादव 64
26. इंद्रधनुषी स्मृतियाँ डॉ. रश्मि दीक्षित 65
27. एक मुलाकात ने मेरा भाग्य ही बदल डाला प्रो. ठाकुर दास 67
28. यादों की बारात डॉ. श्रीभगवान शर्मा 69
29. पास-पड़ोस प्रो. राजेश्वर प्रसाद 71
30. आशा का अनुबंध डॉ. बी. रामसंजीवय्या 72
31. 'वसुधैव कुटुम्बकम' डॉ. रामलाल वर्मा 73
32. दूसरा आँगन डॉ. कान्तिभाई सी. परमार 75
33. जब पढ़ने आया प्रो. लक्ष्मन सेनेविरत्न 78
34. पहला शेकहैंड! डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी 80
35. सीखने के दिन! डॉ. जीतेन्द्र वर्मा 82
36. एक छोटा विश्व चक्रधर शतपथी 84
37. कुल 365 दिन डॉ. ऋषि भूषण चौबे 85
38. जब छात्र था विट्ठलनारायण चौधरी 87
39. हिंदी का विश्वरूप अजयेंद्रनाथ त्रिवेदी 89
40. मेरे कैमरे से! डॉ. सत्यनारायण गोयल 'छविरत्न' 91


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